आपदा प्रबंन्धन

पर्यावरण संकट एवं आपदा क्या है ? आपदा का वर्गीकरण कीजिए

उत्तर- वे घटनाएँ अथवा दुर्घटनाएँ जो प्राकृतिक प्रक्रमों या मानवीय कारणों से उत्पन्न होती हैं , चरम घटनाएँ ( Extreme events ) कहलाती हैं । ऐसी घटनाएँ अपवाद – रूप में उत्पन्न होती हैं तथा प्राकृतिक पर्यावरण के प्रक्रमों को उग्र कर देती हैं जो मानव – समाज के लिए आपदा बन जाते हैं ; उदाहरणार्थ – पृथ्वी की विवर्तनिक संचलनों के कारण भूकम्प या ज्वालामुखी विस्फोट होना , निरन्तर सूखा पड़ना या आकस्मिक रूप से बाढ़ें आना , ऐसी ही प्राकृतिक आपदाएँ हैं । पर्यावरणीय संकट की परिभाषा ऐसी चरम घटनाओं ( प्राकृतिक या मानवकृत ) के रूप में दी जा सकती है , जो सहने की सीमा से परे होती हैं तथा सम्पत्ति एवं जनजीवन का विनाश उत्पन्न करती हैं । 

आपदा वर्गीकरण – उत्पत्ति के कारणों के आधार पर आपदाओं को दो वर्गों में रखा जाता है- ( 1 ) प्राकृतिक आपदाएँ तथा ( 2 ) मानवजनित आपदाएँ 

भूस्खलन एवं एवलांश – लोगों का ऐसा मानना है कि धरातल जिस पर हम रहते हैं , ठोस आधारशिला है । किन्तु इस मान्यता के विपरीत , पृथ्वी का धरातल अस्थिर है , अर्थात् यह ढाल से नीचे की ओर सरक सकता है । भूस्खलन एक प्राकृतिक परिघटना है जो भूगर्भिक कारणों से होती है , जिसमें मिट्टी तथा अपक्षयित शैल पत्थरों की , गुरुत्व की शक्ति से , ढाल से नीचे की ओर आकस्मिक गति होती है । अपक्षयित पदार्थ मुख्य धरातल से पृथक् होकर तेजी से ढाल पर लुढ़कने लगता है । यह 300 किमी प्रति घण्टा की गति से गिर सकता है । जब भूस्खलन विशाल शैलपिण्डों के रूप में होता है तो । शैल एवलांश कहा जाता है । स्विट्जरलैण्ड , नॉर्वे , कनाडा आदि देशों में तीव्र ढालों वाली घाटियों की तली में बसे गाँव प्रायः शिला – पिण्डों के सरकने से नष्ट हो जाते हैं । भारत में भी जम्मू एवं कश्मीर , हिमाचल प्रदेश , उत्तराखण्ड एवं उत्तर – पूर्वी राज्यों में प्रायः भूस्खलनों के समाचार मिलते रहते हैं । भूस्खलनों से सड़क परिवहन का बाधित होना सामान्य परिघटना है । कभी – कभी छोटी नदियाँ भी भूस्खलनों से अवरुद्ध हो जाती हैं । शिलाचूर्ण से मिश्रित हिम की विशाल राशि , जो भयंकर शोर के साथ पर्वतीय ढालों से नीचे की ओर गिरती है , एवलांश कहलाती है । एवलांश भी मानवीय बस्तियों को ध्वस्त कर देते हैं । 

अग्निकाण्ड – अग्निकाण्ड प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों कारणों से होते हैं । प्राकृतिक कारणों में तड़ित ( Lightening ) या बिजली गिरना , वनाग्नि ( Forest – fire ) तथा ज्वालामुखी उद्गार सम्मिलित हैं । मानवीय कारणों में असावधानी , बिजली का शॉर्ट सर्किट , गैस सिलिण्डर का फटना आदि सम्मिलित हैं । इन सभी कारणों से उत्पन्न अग्निकाण्डों में वनाग्नि तथा बिजली के शॉर्ट सर्किट द्वारा उत्पन्न अग्निकाण्ड सबसे महत्त्वपूर्ण हैं । वनों में आग लगना एक सामान्य घटना है । जंगल या वन में लगी आग को वनाग्नि या दावाग्नि कहते हैं । यह वृक्षों की परस्पर रगड़ ( जैसे — बाँस के वृक्ष ) , असावधानीवश भूमि पर जलती सिगरेट आदि फेंक देने अथवा कैम्प – फायर के दौरान होती है । इस प्रकार की आग से ऊँची लपटें तो नहीं निकलती हैं किन्तु धरातल पर पड़े हुए समस्त पदार्थ जलकर खाक हो जाते हैं । छोटी – मोटी झाड़ियाँ भी जल जाती हैं । सबसे विनाशकारी वितान – अग्नि ( Crown – fire ) होती है जिससे बड़े पैमाने पर विनाश होता है । ऐसे अग्निकाण्ड घने वनों में होते हैं । वनाग्नि के परिणाम दूरगामी होते हैं । इससे वन्य जीव – जन्तु व वनस्पतियाँ ही नहीं , समस्त पारिस्थितिकी प्रभावित होती है । नगरों तथा बस्तियों में अग्निकाण्ड से जनजीवन तथा सम्पत्ति की बहुत हानि होती है । निर्धन लोगों की झुग्गी – झोपड़ियों आग लगना सहज बात होती है । नगरीय इमारतों में बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने की घटनाएँ होती हैं । मेलों तथा जलसों में भी शॉर्ट सर्किट से प्राय : आग लग जाती है । इस सन्दर्भ में सन् 1995 में डबबाली ( जिला सिरसा , हरियाणा ) में एक विद्यालय के वार्षिक जलसे में शॉर्ट सर्किट से उत्पन्न अग्निकाण्ड में 468 लोगों की जाने चली गयीं । 10 अप्रैल , 2006 को उत्तर प्रदेश के मेरठ नगर के विक्टोरिया पार्क में आयोजित एक उपभोक्ता मेले में 50 से अधिक लोग अग्निकाण्ड में मृत हुए तथा 100 से अधिक गम्भीर रूप से घायल हो गये । दीर्घ उत्तरीय प्रश्न प्रश्न 1. आपदा प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं ? कौन – कौन सी संस्थाएँ इस कार्य में संलग्न हैं ? भारत में आपदा प्रबन्धन की विवेचना कीजिए । ( 2015 ) आपदा प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं ? ( ( 2017 ) आपदा प्रबन्धन की अवधारणा की व्याख्या कीजिए । ( 2017 ) या या या

आपदा प्रबन्धन प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने अर्थात् उनके प्रबन्धन के तीन पक्ष हैं—

 ( i ) आपदाग्रस्त लोगों को तत्काल राहत पहुँचाना , 

( ii ) प्रकोपों तथा आपदाओं की भविष्यवाणी करना तथा 

( iii ) प्राकृतिक प्रकोपों से सामंजस्य स्थापित करना । 

आपदाग्रस्त लोगों को राहत पहुंचाने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं 

  1. आपदा की प्रकृति तथा परिमाण का वास्तविक चित्र उपलब्ध होना चाहिए । प्राय : मीडिया की रिपोर्ट घटनाओं का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करने की अपेक्षा भ्रमपूर्ण तथ्य प्रस्तुत करती है । ( यद्यपि ऐसा जान – बूझकर नहीं किया जाता है , पर्यवेक्षक या विश्लेषणकर्ता के व्यक्तिगत मत के कारण ऐसा होता है ) । अतएव , अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों को सम्बन्धित सरकार से जानकारी हासिल करनी चाहिए । 
  2. निवारक तथा राहत कार्यों को अपनाने के पूर्व प्राथमिकताएँ निश्चित कर लेनी चाहिए । उदाहरणार्थ – राहत कार्य घने आबाद क्षेत्रों में सर्वप्रथम करने चाहिए । बचाव के विशिष्ट उपकरण , मशीने , पम्प , तकनीशियन आदि तुरन्त आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भेजने चाहिए । दवाएँ तथा औषधियाँ भी उपलब्ध करानी चाहिए । 
  3. विदेशी सहायता सरकार के निवेदन पर ही आवश्यकतानुसार भेजनी चाहिए अन्यथा आपदाग्रस्त क्षेत्र में अनावश्यक सामग्री सम्बन्धी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तथा समस्याएँ अधिक जटिल हो जाती हैं । 
  4. प्राकृतिक आपदाओं के प्रबन्धन में शोध तथा भविष्यवाणी का बहुत महत्त्व है । प्राकृतिक आपदाओं की पूर्वसूचना ( भविष्यवाणी ) किसी प्राकृतिक आपदा से ग्रस्त क्षेत्र में आपदा की आवृत्ति , पुनरावृत्ति के अन्तराल , परिमाण , घटनाओं के विस्तार आदि के इतिहास के अध्ययन के आधार पर की जानी चाहिए । उदाहरण के लिए , बड़े भूस्खलन के पूर्व किसी क्षेत्र में पदार्थ का मन्द सर्पण लम्बे समय तक होता रहता है ; किसी विस्फोटक ज्वालामुखी उद्गार के पूर्व धरातल में साधारण उभार पैदा होता है तथा स्थानीय रूप से भूकम्पन होने लगता है । नदी बेसिन के संग्राहक क्षेत्र में वर्षा की मात्रा तथा तीव्रता के आधार पर सम्भावित बाढ़ की स्थिति की भविष्यवाणी सम्भव है । स्रोतों के निकट उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों तथा स्थानीय तूफानों एवं उनके गमन मार्गों का अध्ययन आवश्यक है । 
  5. प्राकृतिक प्रकोपों एवं आपदाओं का मानचित्रण करना , मॉनीटर करना तथा पर्यावरणीय दशाओं में वैश्विक परिवर्तनों का अध्ययन करना बहुत आवश्यक है । इसके लिए वैश्विक , प्रादेशिक एवं स्थानीय स्तरों पर आपदा – प्रवण क्षेत्रों का गहरा अध्ययन आवश्यक होता है । इण्टरनेशनल काउन्सिल ऑफ साइण्टिफिक यूनियन ( ICSU ) तथा अन्य संगठनों ने मानवीय क्रियाओं तथा प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले पर्यावरणीय परिवर्तनों की क्रियाविधि , मॉनीटरिंग तथा उन्हें कम करने सम्बन्धी अनेक शोधकार्य प्रारम्भ किये हैं । आपदा – शोध तथा आपदा कम करने सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम निम्नलिखित ( SCOPE ICSU ने साइण्टिफिक कमेटी ऑन प्रॉब्लम्स ऑफ एनवायरन्मेण्ट नामक समिति की स्थापना 1969 में की , जिसका उद्देश्य सरकारी तथा गैर – सरकारी संगठनों के लिए पर्यावरण पर मानवीय प्रभावों तथा पर्यावरणीय समस्याओं सम्बन्धी घटनाओं की समझ में वृद्धि करना है । 

( i ) SCOPE यूनाइटेड नेशन्स के एनवायन्मेण्ट कार्यक्रम ( UNEP ) , यूनेस्को के मानव एवं बायोस्फियर कार्यक्रम ( MAB ) तथा WMO के वर्ल्ड क्लाइमेट प्रोग्राम ( WCP ) की भी सहायता करता है । 

( ii ) IGBPICSU ने अक्टूबर , 1988 में स्टॉकहोम ( स्वीडन ) में इण्टरनेशनल जिओस्फियर बायोस्फियर कार्यक्रम ( IGBP ) या ग्लोबल चेन्ज कार्यक्रम ( GCP ) भूमण्डलीय पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों का अध्ययन करने के लिए प्रारम्भ किया । यह कार्यक्रम भौतिक पर्यावरण के अन्तक्रियात्मक प्रक्रमों के अध्ययन पर बल देता है । ये अध्ययन उपग्रह दूर संवेदी तकनीकों , पर्यावरणीय मॉनीटरिंग तथा भौगोलिक सूचना तन्त्रों ( GIS ) पर आधारित हैं । 

( iii ) HDGC_ सामाजिक वैज्ञानिको ने ‘ ह्यूमन डाइमेन्शन ऑफ ग्लोबल चेंज ‘ ( HDGC ) नामक एक समानान्तर शोध कार्य चालू किया है । यह कार्यक्रम GNU , ISSC तथा IFIAS जैसे संगठनों से सहायता तथा वित्त प्राप्त करता है

( iv ) IDNDR – UNO ने 1990-2000 के लिए IDNDR ( International Decade for Natural Disaster Reduction ) कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसका उद्देश्य विश्व की प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं का

अध्ययन करना तथा मानव समाज पर उसके घातक प्रभावों को कम करना था । इसके अन्तर्गत भूकम्प , ज्वालामुखी उद्गार , भू – स्खलन , सूनामी , बाढ़ें , तूफान , वनाग्नि , टिड्डी – प्रकोप तथा सूखा जैसे प्रक्रम सम्मिलित है । इस कार्यक्रम के अन्तर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं 

( a ) प्रत्येक देश में प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की क्षमता में सुधार करना । 

( b ) प्राकृतिक आपदाओं को कम करने सम्बन्धी जानकारी बढ़ाने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकसित करना । 

( c ) प्राकृतिक आपदाओं के आकलन , भविष्यवाणी , रोकने तथा कम करने की दिशा में वर्तमान तथा नयी सूचनाओं का संग्रह करना । 

( d ) अनेक विधियों तथा प्रदर्शन परियोजनाओं के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं के आकलन , भविष्यवाणी , रोकने तथा कम करने के उपाय करना । 

  1. प्राकृतिक प्रकोपों को कम करने हेतु आपदा शोध में निम्नलिखित सम्मिलित हैं 

( i ) प्राकृतिक प्रकोप एवं आपदा के कारकों तथा क्रियाविधि का अध्ययन । 

( ii ) प्राकृतिक प्रकोपों तथा आपदा के विभाव ( सम्भावना ) का वर्गीकरण एवं पहचान करना तथा आँकड़ा – आधार तैयार करना जिसमें पारितन्त्र के भौतिक तथा सांस्कृतिक घटकों , परिवहन एवं संचार साधनों , भोजन , जल एवं स्वास्थ्य सुविधाओं , प्रशासनिक सुविधाओं आदि का मानचित्रण करना सम्मिलित हैं । प्राकृतिक आपदा शोध का महत्त्वपूर्ण पक्ष दूर संवेदन , इंजीनियरिंग , इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों से धरातलीय जोखिम के क्षेत्रों की पहचान करना है । 

  1. – आपदा कम करने के कार्यक्रम में आपदा सम्बन्धी शिक्षा की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है । इस शिक्षा का आधार व्यापक होना चाहिए तथा यह वैज्ञानिकों , इंजीनियरो , नीति एवं निश्चयकर्ताओं तथा जनसाधारण तक जनसंचार के माध्यमों ( समाचार – पत्र , रेडियो , टेलीविजन , पोस्टरों , डॉक्यूमेण्ट्री फिल्मों आदि ) द्वारा पहुँचनी चाहिए । अधिकांश देशों में जनता को आने वाली आपदा की सूचना देने का उत्तरदायित्व सरकार का होता है । अतएव शोधकर्ताओं एवं वैज्ञानिकों को निश्चयकर्ताओ ( प्रशासकों एवं राजनीतिज्ञों ) को निम्नलिखित उपायों द्वारा शिक्षित करने की आवश्यकता है 

( i ) निश्चयकर्ताओं तथा सामान्य जनता को प्राकृतिक प्रकोपों एवं आपदाओं के प्रति सचेत करना तथा उन्हें स्थिति का सामना करने के लिए प्रशिक्षित करना । समय से पहले ही सम्भावित आपदा की सूचना देना । 

( ii ) जोखिम तथा संवेदनशीलता के मानचित्र उपलब्ध कराना । 

( iv ) लोगों को आपदाओं से बचने के लिए निर्माण कार्य में सुधार करने के लिए प्रेरित करना । ( आपदा कम करने की तकनीकों की व्याख्या करना । 

  1. भौगोलिक सूचना तन्त्र ( GIS ) तथा हवाई सर्वेक्षणों द्वारा प्राकृतिक आपदा में कमी तथा प्रबन्धन कार्यक्रमों में सहायता मिल सकती है । 9. जनता को प्राकृतिक आपदाओं के साथ सामंजस्य करने की आवश्यकता है , जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं 

( i ) प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं के प्रति व्यक्तियों , समाज एवं संस्थाओं के बोध ( Perception ) एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन । ( ii ) प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं के प्रति चेतना में वृद्धि । 

( ii ) प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं की समय से पूर्व चेतावनी का प्रावधान । ( भूमि उपयोग नियोजन ( उदाहरणार्थ – आपदा प्रवण क्षेत्रों की पहचान तथा सीमांकन एवं लोगों को ऐसे क्षेत्रों में बसने के लिए हतोत्साहित करना 

( iii ) सुरक्षा बीमा योजनाओं द्वारा जीवन एवं सम्पत्ति की हानि के मुआवजे का प्रावधान करना , जिससे समय रहते लोग अपने घर , गाँव , नगर आदि छोड़ने के लिए तैयार रहें । 

( vi ) आपदा से निपटने की तैयारी का प्रावधान ।

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