धर्म और नैतिकता की प्रथाएं

अलौकिक शक्ति में विश्वास – प्रत्येक धर्म मनुष्य की शक्ति से ऊपर एक अलौकिक शक्ति में विश्वास करता है । किसी समाज में इस शक्ति को साकार माना जाता है तो किसी में निराकार । 

स्वधर्म श्रेष्ठता – धर्म का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म को सर्वोच्च स्थान देता है । सभ्य – से – सभ्य समाज भी इस विचार से बचने में सफल नहीं हो सके हैं । इस विचार से प्रेरित होकर एक धर्म को मानने वाले अपना धर्म दूसरों पर लादने का भरसक प्रयत्न करते हैं । जो व्यक्ति अपने धर्म के साथ अन्य धर्म को भी श्रेष्ठ मानता है उसे पाखण्डी और धर्म विरोधी कहा जाता है

लघ उत्तरीय प्रश्न प्रश्न समाज पर धर्म के कोई चार प्रभाव लिखिए

धर्म के चार कार्यों का उल्लेख कीजिए

उत्तर- धर्म समाजशास्त्रीय सद्कार्य करने की प्रेरणा देता है । मनुष्य समाज – विरोधी कार्यों से हटकर सामाजिक नियमों का पालन करता है । इस प्रकार धर्म सामाजिक नियन्त्रण का रक्षा कवच है । धर्म का सामाजिक जीवन में विशेष महत्त्व है । समाज पर धर्म के चार प्रभाव निम्नलिखित हैं 

निराशाओं को दूर करने में सहायक – धर्म समय – समय पर व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाली निराशाओं व चिन्ताओं को दूर करके उन्हें शान्ति प्रदान करता है । यह उन्हें कष्टों को सहन करने की शक्ति भी प्रदान करता है । यही कारण है कि विपत्तियों के दिनों में व्यक्तियों के व्यवहारों में धार्मिकता अधिक देखी जाती है । 

जीवन में निश्चितता लाना – धर्म जीवन में निश्चितता लाता है । यह समाज द्वारा स्वीकृत प्रथाओं व मान्यताओं को स्पष्ट करता है , संस्कृति व पर्यावरण को दृढ़ता प्रदान करता है और रीति – रिवाजों को धार्मिक मान्यता देकर जीवन में निश्चितता लाता है । 

मानव – व्यवहार में नियन्त्रण – धर्म जीवन में निश्चितता लाने के साथ – साथ मानव – व्यवहार पर नियन्त्रण रखने में भी सहायक है । यह व्यक्ति को अनैतिक कार्यों को करने से रोकता है । इस प्रकार यह व्यक्तियों के व्यवहार पर अनौपचारिक रूप से नियन्त्रण रखने का महत्त्वपूर्ण साधन है । 

प्रथाओं को संरक्षण देना – धर्म सामाजिक आदर्शों व प्रथाओं को मान्यता देकर उन्हें केवल संरक्षण ही प्रदान नहीं करता , अपितु इन्हें सुदृढ़ भी बनाता है । जिन आदर्शों , मान्यताओं व प्रथाओं को धार्मिक स्वीकृति मिल जाती है , उन्हें परिवर्तित करना कठिन कार्य हो जाता है तथा वे धीरे – धीरे सबल होती जाती है । 

प्रथा का क्या अर्थ है ? 

प्रथा सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग है । समाज में कार्य करने की जो मान्यता प्राप्त विधियाँ होती है , उन्हें प्रथा कहा जाता है । लोकरीतियाँ जब लम्बे समय तक प्रचलन में रहने के पश्चात् सामाजिक मान्यता प्राप्त कर लेती हैं तथा उसका हस्तान्तरण अगली पीढ़ी के लिए होने लगता है तब वे प्रथाएं बन जाती है । समाज में रहकर मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए नयी – नयी विधियाँ खोजता है । धीरे – धीरे इन विधियों को जनसामान्य का समर्थन मिल जाता है । विधियों की निरन्तर पुनरावृत्ति होने पर वह प्रथा का रूप ग्रहण कर लेती हैं । प्रथाएँ समाज की धरोहर होती हैं । प्रत्येक समाज अपने सदस्यों से यह आशा करता है कि वे इस सामाजिक धरोहर को अक्षुण्ण बनाये रखें । आदिम समाज से लेकर वर्तमान जटिल समाज तक प्रथाओं को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । प्रथाएँ रूढ़िवादिता की पक्षधर होती हैं तथा नवीनता का विरोध करती है ।

सामाजिक नियन्त्रण में प्रथाओं की भूमिका 

प्रथाएँ सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग हैं । मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इनका सहारा लेता है । अनेक समाजों में इनका महत्त्व विधि से भी बढ़कर होता है । प्रथाएँ व्यक्ति के व्यवहारों को नियन्त्रित करने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । प्रथाओं के अनुपालन से समाज में सुरक्षा आती है , जो सामाजिक नियन्त्रण का प्रतीक है । प्रथाएँ सामाजिक नियन्त्रण में निम्नवत् अपनी भूमिका का निर्वहन करती हैं 

  1. सीखने की प्रक्रिया द्वारा सामाजिक नियन्त्रण – प्रथाएँ पीढ़ी – दर – पीढ़ी हस्तान्तरित होती हैं । ये मानव – जीवन के व्यवहार के आवश्यक अंग बन जाती हैं । समाज से मान्यता प्राप्त प्रविधियाँ सीखने की प्रक्रिया को सरल और तीव्र कर देती हैं । प्रथाओं के माध्यम से मूल्यों के अनुपालन की कला सीखकर व्यक्ति समाज में योग देकर सामाजिक नियन्त्रण का कारण बन जाता है । अनुभवों से प्राप्त पूर्वजों का यह ज्ञान सीखने की प्रक्रिया को सरल कर देता है । इस प्रकार प्रथाएँ सीखने की प्रक्रिया सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन द्वारा सामाजिक नियन्त्रण में अपना योगदान देती हैं । करके सामाजिक नियन्त्रण में सहायक 
  2. सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करके व्यक्तित्व का निर्माण करके सामाजिक सामाजिक नियन्त्रण में सहायक – प्रथाएँ अनेक नियन्त्रण में सहयोग सामाजिक समस्याओं को हल करने में सक्षम हैं । कठिन • सामाजिक कल्याण में वृद्धि करके परिस्थितियाँ आने पर भी व्यक्ति प्रथाओं के सहारे उनका सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग समाधान खोज ही लेता है । प्रथाएँ समयानुकूल नयी सामाजिक अनुकूलन में सहयोग देकर विधियों को जन्म देकर सामाजिक नियन्त्रण को सुदृढ़ सामाजिक नियन्त्रण में भूमिका सामाजिक जीवन में एकरूपता लाकर करती हैं । सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग 
  3. व्यक्तित्व का निर्माण करके सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग – नवजात शिशु प्रथाओं के बीच आँखें खोलता है । प्रथाओं से उसका लालन – पालन होता है । प्रथाएँ उसके विकास में सहायक होती हैं । यहाँ तक कि उसका मृत्यु – संस्कार भी प्रथाओं के अनुरूप ही होता है । प्रथाएँ व्यक्तित्व के विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । संस्कारित व्यक्ति सामाजिक नियन्त्रण के कार्य में अपना भरपूर सहयोग देता है । 
  4. सामाजिक कल्याण में वृद्धि करके सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग – प्रथाएँ व्यक्ति को समाज – विरोधी कार्यों से सुरक्षित रखती हैं । प्रथाओं का विकास समाज हित और जनकल्याण को ध्यान में रखकर किया जाता है । प्रथाएँ अधिकतम व्यक्तियों का हित करके सामाजिक नियन्त्रण के कार्य में पूरा – पूरा सहयोग देती हैं । 
  5. सामाजिक अनुकूलन में सहयोग देकर सामाजिक नियन्त्रण में भूमिका – प्रथाएँ व्यक्ति को उचित – अनुचित का ज्ञान कराकर सामाजिक मूल्यों के अनुपालन का मार्ग प्रशस्त करती हैं । प्रथाएँ व्यक्ति के समाजीकरण में सहायक होकर उसे समाज के अनुकूल ढाल देती हैं । सामाजिक मूल्यों और आदर्शों को ग्रहण करके व्यक्ति अपना व्यवहार समाज के अनुकूल बदल लेता है । इस प्रकार का व्यवहार सामाजिक नियन्त्रण में भरपूर सहयोग देता है । 6. सामाजिक जीवन में एकरूपता लाकर सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग – प्रथाएँ समाज के सभी सदस्यों को आदर्शों के अनुरूप एक समान व्यवहार करने की प्रेरणा देती हैं । प्रथाएँ सदस्यों को व्यवहार का अंग बनकर उनमें एकरूपता उत्पन्न करने में सहयोग देती हैं । सामाजिक जीवन में एकरूपता आने से सामाजिक नियन्त्रण को बल मिलता है । सामाजिक एकरूपता व्यक्तिवादी विचारधारा पर अंकुश लगाकर संघर्ष से बचाव करती है । 

उत्तर नैतिकता की परिभाषा 

उचित – अनुचित के विचार की संकल्पना को नैतिकता कहा जाता है । नैतिकता वह है जो हमें किसी कार्य को करने की या न करने की आज्ञा देती है । नैतिकता में यह भाव भी समाहित है कि अमुक कार्य अनुचित है ; अत : उसे नहीं करना चाहिए । नैतिकता का आधार पवित्रता , न्याय और सत्य होते हैं । अन्तरात्मा की सही आवाज नैतिकता है । नैतिकता के मूल्यों को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है ; अत : इसका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का पावन कर्त्तव्य बन जाता है । नैतिकता का वास्तविक अर्थ जानने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं का अनुशीलन करना होगा । विभिन्न समाजशास्त्रियों ने नैतिकता की परिभाषा निम्नवत् प्रस्तुत की है मैकाइवर एवं पेज के अनुसार , “ नैतिकता का तात्पर्य नियमों की उस व्यवस्था से है जिसके द्वारा व्यक्ति का अन्तःकरण अच्छे और बुरे का बोध प्राप्त करता है । ‘ किंग्स्ले डेविस के अनुसार , “ नैतिकता कर्त्तव्य की भावना पर अर्थात् उचित व अनुचित पर बल देती है । ” जिसबर्ट के अनुसार , ” नैतिक नियम , नियमों की वह व्यवस्था है जो अच्छे और बुरे से सम्बद्ध है तथा जिसका अनुभव अन्तरात्मा द्वारा होता है । ” नैतिकता , आचार – संहिता का दूसरा नाम है । आचार संहिता का उल्लंघन नैतिकता का उल्लंघन है , जिसे समाज बुरा समझता है । नैतिकता में सार्वभौमिकता का गुण पाया जाता है , अर्थात् नैतिकता विश्व के सभी समाजों में विद्यमान रहती है । प्रो ० कोपर के अनुसार , नैतिकता के साथ व्यवहार के कुछ नियम जुड़े हैं ; जैसे – चोरी न करना , बड़ों का सम्मान करना , चुगली न करना , परिवार का पालन – पोषण करना , किसी की हत्या न करना तथा अविवाहितों को यौन सम्बन्ध स्थापित न करना । नैतिकता अच्छाई और बुराई का बोध कराती है । नैतिकता के नियमों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति का अन्त : करण उसे धिक्कारता है । नैतिकता के पीछे सामाजिक शक्ति होती है । नैतिकता , व्यक्ति के अन्त : करण द्वारा उचित – अनुचित का बोध है ।

नैतिकता की विशेषताएँ 

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम नैतिकता की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख कर सकते हैं 

  1. नैतिकता व्यवहार के वे नियम हैं जो व्यक्ति में उचित – अनुचित का भाव जगाते हैं । 
  2. नैतिकता व्यक्ति के अन्त : करण की आवाज है । यह सामाजिक व्यवहार का उचित प्रतिमान है । 
  3. नैतिकता के साथ समाज की शक्ति जुड़ी होती है । 
  4. नैतिकता तर्क पर आधारित है । नैतिकता का सम्बन्ध किसी अदृश्य पारलौकिक शक्ति से नहीं होता । 
  5. नैतिकता परिवर्तनशील है । इसके नियम देश , काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं । 
  6. नैतिकता का सम्बन्ध समाज से है । समाज जिसे ठीक मानता है , वही नैतिक है । 
  7. नैतिक मूल्यों का पालन व्यक्ति स्वेच्छा से करता है , किसी ईश्वरीय शक्ति के भय से नहीं । 
  8. नैतिकता व्यक्ति के कर्त्तव्य और चरित्र से जुड़ी है । 
  9. नैतिकता का आधार पवित्रता , ईमानदारी और सत्यता आदि गुण होते हैं । 
  10. नैतिकता कभी – कभी धर्म के नियमों का प्रतिपादन करती प्रतीत होती है । 

धर्म की अवधारणा 

धर्म की समाजशास्त्रीय विवेचना करने वाले विद्वानों में टायलर , फ्रेजर , दुखीम , मैक्स वेबर , पारसन्स , मैकिम मेरिएट आदि के नाम प्रमुख हैं । इन विद्वानों ने भिन्न – भिन्न दृष्टिकोण से धर्म की विवेचना की है , लेकिन एक सामान्य निष्कर्ष के रूप में सभी ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि धर्म अनेक विश्वासों और आचरणों की वह संगठित व्यवस्था है जिसका सम्बन्ध कुछ अलौकिक विश्वासों तथा पवित्रता की भावना से होता है । स्पष्ट है कि इस रूप में सामाजिक संगठन तथा व्यक्ति के व्यवहारों को प्रभावित करने में धर्म का विशेष योगदान होता है । इस सन्दर्भ में किंग्स्ले डेविस ने लिखा है , ” धर्म मानव – समाज का एक ऐसा सार्वभौमिक , स्थायी और शाश्वत तत्त्व है जिसे समझे बिना समाज के रूप को बिल्कुल भी नहीं समझा विभिन्न विद्वानों के विचारों के सन्दर्भ में धर्म के अर्थ को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है 

टायलरने धर्म की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है , ” धर्म का अर्थ किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास करना है । ” इस कथन के द्वारा टायलर ने यह स्पष्ट किया कि धर्म का सम्बन्ध उन आचरणों और विश्वासों से है जो किसी अलौकिक शक्ति से सम्बन्धित होते हैं । यही विश्वास मानव – व्यवहारों को नियन्त्रित करने का एक प्रमुख आधार है । जेम्स फ्रेजरके अनुसार , “ धर्म से मेरा तात्पर्य मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की सन्तुष्टि अथवा आराधना करना है जिनके बारे में व्यक्तियों का यह विश्वास हो कि वे प्रकृति और मानव – जीवन को नियन्त्रित करती हैं तथा उन्हें मार्ग दिखाती हैं । ” वास्तव में , धर्म एक जटिल व्यवस्था है । धर्म की प्रकृति को किसी विशेष परिभाषा के द्वारा स्पष्ट कर सकना बहुत कठिन है । इस दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि कुछ प्रमुख विशेषताओं अथवा तत्त्वों के आधार पर धर्म की प्रकृति को स्पष्ट किया जाए 

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