महिला उत्पीड़न

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प्रश्न 1.हिंसा मानव की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसका निर्गुण में जितना निषेध होता है , सगुण में उसका उतना ही जबरदस्त आकर्षण भी है । ” यह कथन किसके द्वारा प्रतिपादित है ? 

उत्तर- उपर्युक्त कथन सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा हिंसा की मूल प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हुए कहा गया है । 

प्रश्न 2. सती प्रथा उन्मूलन का श्रेय किसको जाता है ? 

उत्तर- सती प्रथा उन्मूलन का श्रेय राजा राममोहन राय को जाता है ।

प्रश्न 3. भारत में बाल विवाह के उन्मूलन हेतु अंग्रेजी शासनकाल में बने अधिनियम का क्या नाम था और यह कब से प्रभाव में आया था ? 

उत्तर- अंग्रेजी शासनकाल में बाल विवाह रूपी ज्वलंत समस्या के निराकरण के लिए ” बाल विवाह निरोधक अधिनियम -1929 ” में प्रभाव में आया था । 

प्रश्न 4. ‘ स्वधार ‘ नामक महिला हेल्पलाइन किस पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ की गई थी ? 

उत्तर- ‘ स्वधार ‘ नामक महिला हेल्पलाइन बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ की गई थी ।

प्रश्न 5. महिला समाख्या योजना कब प्रारम्भ हुई थी ? 

उत्तर- महिला समाख्या योजना सन् 1989 में प्रारम्भ हुई थी । 

प्रश्न 6. कन्या भ्रूण हत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध कब से लगाया गया था ? 

उत्तर – कन्या भ्रूण हत्या पर प्रतिबन्ध 1 जनवरी , 1996 से लगाया गया था । प्रश्न 

  1. किस पंचवर्षीय योजना में महिला कल्याण शब्द के स्थान पर महिला किसा शब्द का प्रयोग किया गया था ? उत्तर- पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में महिला कल्याण शब्द के स्थान पर महिला विकास शब्द का प्रयोग किया था ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. स्त्रियों के विरुद्ध हिंसात्मक व्यवहार के स्वरूप बताइए । 

उत्तर – स्त्रियों के विरुद्ध हिंसात्मक व्यवहार के स्वरूप निम्नलिखित हैं 1. सती – प्रथा , 2. बलात्कार , अपहरण और हत्या , 3. कन्या भ्रूण हत्या , 4. घरेलू हिंसा , 5. दहेज प्रथा , 6. देह – व्यापार , 7. अन्य छेड़खानी , ताना मारना , मारना – पीटना , धोखे से विवाह , फिर वेश्या बनाना , कॉल गर्ल्स आदि । 

प्रश्न 2. महिला समाख्या योजना पर टिप्पणी लिखिए । 

उत्तर- महिला समाख्या योजना – यह योजना सन् 1989 में आरम्भ की गई । इस योजना के तहत् ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ जो आर्थिक – सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग की हैं , उन्हें शिक्षित करने / समानता प्राप्त करने हेतु इस योजना का अपना महत्त्व है ; क्योंकि महिला को शिक्षित कर उन्हें शक्तिशाली बनाना है । महिला संघ ग्रामीण स्तर पर , महिलाओं को प्रश्न करने , अपने विचार रखने और अपनी आवश्यकताओं को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है । इस तरह महिलाओं के व्यक्तित्व निर्माण का भी कार्य करती है और महिला सशक्तीकरण का भी । 

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. महिला उत्पीड़न से क्या आशय है ? 

उत्तर- महिला उत्पीड़न से आशय उस प्रक्रिया से है जिसमें महिलाओं को योजनाबद्ध तरीके से अधिकारों , अवसरों तथा संसाधनों से वंचित कर दिया जाता है । उत्पीड़न सामान्य आर्थिक सामाजिक तथा रानीतिक जीवन जीने में बाधा उत्पन्न करता है । उत्पीड़न एक बहुआयामी प्रक्रिया है जिसमें महिला सामाजिक सम्बन्धों से अलग talienate ) हो जाती है या उसका अलगाव हो जाता है और वह समाज में सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाती । इतिहास के विभिन्न कालखण्डों में दुनिया के विभिन्न समाजों में महिलाओं को कमतर आँका गया है । उन्हें समाज में महिलाओं के प्रति भेदभाव या उनका उत्पीड़न सार्वभौमिक और सार्वकालिक रहा है , अर्थात् , व्यक्तिगत सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से बहिष्कृत किया गया है । धर्म तथा पितृसत्ता और पारम्परिक विधान महिलाओं के उत्पीड़न के लिए अधिक जिम्मेदार रहे हैं । महिलाओं के उत्पीड़न में धर्म की भूमिका अधिक प्रभावी रही है । विभेदपरक दृष्टिकोण महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करता रहा है । महिलाओं के विरुद्ध जनमानस का विचार बनाने में धार्मिक विश्वासजनित आध्यत्मिक मान्यताओं का प्रमुख स्थान होता है । इन अन्तर्विरोधी धार्मिक मान्यताओं की परिणति महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के रूप में होता है । प्रचलित पारम्परिक मान्यताओं के आधार पर महिलाओं में सामाजिक मूल्यों को इस तरह आपूरित कर दिया जाता है कि महिलाएँ हिंसा का प्रतिरोध न कर सकें । साथ ही पितृसत्ता के समर्थक अपने क्रियाकलापों को धार्मिक आवरण के माध्यम से सही सिद्ध करते हैं । महिलाओं को हिंसा सहने के लिए आध्यात्मिक उपकरण के माध्यम से तैयार करने के पश्चात् धार्मिक मान्यताओं के द्वारा महिलाओं को ऐसी जीवन – शैली अपनाने के लिए बाध्य किया जाता है , जो उत्पीड़न के अन्तर्गत आती है । महिलाओं के पहनावे , खान – पान इत्यादि पर प्रतिबन्ध लगा दिए जाते हैं । धर्म के आधार पर महिलाओं के लिए भिन्न – भिन्न विवाह तथा उत्तराधिकार सम्बन्धी नियम भी उत्पीड़न को बढ़ावा देते हैं । 

प्रश्न 2 भारतीय स्त्रियों की दो प्रमुख समस्याएँ बताइए । 

उत्तर- भारतीय स्त्रियों की दो प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं 

  1. अशिक्षा की समस्या -भारतीय समाज में स्त्रियों की शिक्षा कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया । यद्यपि अंग्रेजी शासनकाल में तथा स्वन्तत्रता प्राप्ति के पश्चात् इस ओर काफी ध्यान दिया गया है , फिर भी स्त्रियों में शिक्षा का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में कहीं कम है । 2011 ई ० की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर 73 प्रतिशत है । पुरुषों के लिए यह 80.89 प्रतिशत तथा स्त्रियों के लिए यह 64.64 प्रतिशत है । इस तथ्य से सरलता से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय समाज में स्त्रियाँ शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं क्योंकि लड़कियों को पराया धन माना जाता है तथा विवाह ही उनके लिए एक आदर्श माना जाता है , इसलिए उनकी शिक्षा पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता । बहुत – सी लड़कियाँ जो शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश लेती हैं , अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाती । 
  2. अज्ञानता एवं अंधविश्वास –अशिक्षा के कारण भारतीय स्त्रियाँ सरलता से अन्धविश्वासों का शिकार हो जाती है । उनमें अशिक्षा के कारण अज्ञानता भी अधिक पायी जाती है । इसीलिए अज्ञानता एवं अन्धविश्वास को भारतीय स्त्रियों की एक समस्या माना गया है । अज्ञानता एवं अन्धविश्वास के कारण ही स्त्रियाँ तान्त्रिकों , ढोंगी साधुओं के चक्कर में सरलता से पड़ जाती हैं जो उनका आर्थिक शोषण करते हैं तथा कई बार तो वे उनके द्वारा यौन शोषण का भी शिकार हो जाती हैं । अज्ञानता एवं अन्धविश्वास के कारण ही भारतीय स्त्रियाँ व्रत – उपवास में पुरुषों की तुलना में ज्यादा विश्वास रखती हैं । 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रशन 1. समाज के स्त्री – हिंसा के पोषक तत्त्व कौन – कौन से हैं ? 

उत्तर स्त्री – हिंसा के पोषक तत्त्व 

व्यक्ति परिस्थितियों का दास है , पर स्त्री और पुरुष की परिस्थितियों में अन्तर है । क्षमता , शक्ति , योग्यता और संषर्घ करने की क्षमता में भी अन्तर है , संवेदनशीलता में भी काफी अन्तर है । ऐसा नहीं है कि महिलाएँ अपराधी नहीं हैं , वे भी डकैती से लेकर तस्करी तक के क्षेत्र में नामजद है और उन पर भी मुकदमे दर्ज है । जेल में हजारों की संख्या में महिलाएं भी है । हत्या जैसे जघन्य अपराध में भी महिलाएं पीछे नहीं हैं , लेकिन इन सबके पीछे किसी – न – किसी व्यक्ति या अपराधी समूह या रैकेट का हाथ होता है । वर्तमान समय में न जाने कितने यौनकर्मियों के रैकेट हैं , जोकि पुरुषों के निर्देशन में महिलाएं चला रही हैं । महिला उत्पीड़न एवं स्त्री – हिंसा के पोषक तत्त्व निम्नलिखित है 

  1. अराजक तत्व –इनका कोई धर्म , जाति व संप्रदाय नहीं होता । जब भी लोकतंत्र कमजोर होता है , अराजक तत्वों का दबदबा समाज में बढ़ जाता है । इस प्रकार के लोग दिनदहाड़े लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं , जिसके परिणामस्वरूप बलात्कार , अपहरण आदि की दुर्घटनाएँ बढ़ जाती हैं ।
  1. माफिया – नगरों और महानगरों में तरह – तरह के माफियाओं के संगठन हैं । ये धन , बल , गुंडई राजनीति आदि में शक्तिशाली है । इनकी पहुँच दूर – दूर तक है । ये नियोजित ढंग से लड़कियों और महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं । 

3. नशे की दुनिया और नशेबाज – इनके चरित्र का अनुमान स्त्री – हिंसा के पोषक तत्त्व लगाना कठिन है । विशेषतौर से निम्न और निम्न मध्यम वर्ग के नशेबाज चौराहों पर लड़कियों के स्कूल के पास खड़े होकर छेड़खानी करना , व्यंग्य मारना , भद्दे – भद्दे मजाक करना , नशे की दुनिया और नशेबाज जबरदस्ती प्यार दर्शाना आदि करते हैं । इस प्रकार के लोग विद्वेष की भावना परिस्थितिवश अपनी निजी जिन्दगी में भी अपनी पत्नी और बच्चों को • देह – व्यापार के रैकेट मारते – पीटते हैं और कभी – कभी ये इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि पत्नी – बच्चों की हत्या तक कर देते हैं । 

4. विद्वेष की भावना – लड़की जब प्रेमजाल में नहीं फँसती तो बदला लेने की भावना से उस पर तेजाब फेंका जाता है । अपहरण करके सामूहिक बलात्कार यहाँ तक कि उसकी हत्या तक कर दी जाती है । 

परिस्थितिवश – परिवार में कभी – कभी अचानक ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जो अचानक विस्फोटक बन जाती हैं ; जैसे – छोटी – छोटी बातों को लेकर बहस करना , बच्चों को डाँटना , घरेलू कार्यों को लेकर अथवा किसी और कारण से ऐसी गर्म और उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति तैयार हो जाती है कि गाली – गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है । इसी प्रकार की परिस्थितियों में घर – परिवार में भी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होता है जिसमें घर की अन्य महिला सदस्य भी सम्मिलित होती हैं । अत : इस प्रकार की घटनाएं घरेलू हिंसा की श्रेणी में आती हैं । 

5. देह – व्यापार के रैकेट – ये वे रैकेट हैं जो अपने व्यापार में चतुर , सक्षम और अनुभवी होते हैं । ये लड़की को अपनी चालों में फंसाकर उसके घर और परिवार से बाहर निकाल लाते हैं । इसके अलावा ये रैकेट लड़की का अपहरण करके भी उन्हें जबरदस्ती देह – व्यापार के धंधे में डालते हैं तथा ऐसा करने के लिए लड़की को विवश करते हैं , इसके लिए उसे तरह – तरह की यातनाएँ दी जाती हैं और यह तब तक चलता है जब तक वह देह – व्यापार का हिस्सा नहीं बन जाती । समाज में यौन उत्पीड़न , महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार आदि को नियंत्रित करने हेतु उच्चस्तरीय कार्यवाही आवश्यक है जिसके तहत इस प्रकार की गतिविधियों और अभद्र व्यवहार को रोका जा सके । 

प्रश्न 2. घरेलू हिंसा से क्या तात्पर्य है ? महिलाएँ किस प्रकार घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं ? महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विभिन्न स्वरूपों की विवेचना कीजिए । ” महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार एक ज्वलंत सामाजिक समस्या है । ” विवेचना कीजिए । 

उत्तर- भारतीय समाज में महिलाओं को घरेलू हिंसा एवं उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है । यह उत्पीड़न भी अत्यधिक व्यापक है । इसमें भी साधारण उत्पीड़न से लेकर हत्या तक के उदाहरण प्रायः मिलते रहते हैं । इस वर्ग के उत्पीड़न एवं हिंसा का विवरण निम्नवर्णित है 1. दहेज के कारण होने वाली हत्याएँ – भारतीय समाज में दहेज प्रथा भी एक प्रमुख समस्या मानी जाती है । यह भारतीय समाज में पाया जाने वाला एक ऐसा अभिशाप है जो आज भी अनेक सरकारी एवं गैर – सरकारी प्रयासों के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए हुए है । दहेज के कारण लड़की के माता – पिता को कई बार अनैतिक साधनों को अपनाकर उसके दहेज का प्रबन्ध करना पड़ता है । ज्यादा दहेज न ला पाने के कारण अनेक नवविवाहित वधुओं को सास – ससुर तथा ननद आदि के ताने सुनने पड़ते हैं । कई बार तो उन्हें दहेज की बलि पर जिन्दा चढ़ा दिया जाता है । दहेज प्रथा के कारण बेमेल विवाहों को भी प्रोत्साहन मिलता है तथा वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन अत्यन्त संघर्षमय हो जाता है । दहेज न लाने वाली वधुओं को विविध प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक कष्ट सहन करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप वे अनेक बीमारियों का शिकार हो जाती हैं । दुःख की बात तो यह है कि पढ़ी – लिखी लड़कियाँ तथा उनके पढ़े – लिखे माता – पिता भी इस बुराई का विरोध नहीं करते अपितु ज्यादा दहेज देना अपनी शान एवं प्रतिष्ठा समझते हैं । या या

2. महिला उत्पीड़न 175 पिछले कुछ वर्षों में भारत में दहेज के कारण होने वाली स्त्रियों की हत्याओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि है । राम आहूजा के अनुसार दहेज हत्याओं की शिकार अधिकतर मध्यम वर्ग की महिलाएँ होती हैं । ये अधिकतर उच्च जातियों में होती हैं तथा पति पक्ष के लोगों द्वारा ही की जाती हैं । दहेज हत्याओं की शिकार स्त्रियों की आयु 21 से 24 वर्ष के बीच होती है तथा परिवार की रचना की इन हत्याओं में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । दहेज हत्या से पहले स्त्रियों को अनेक प्रकार की यातनाएँ दी जाती हैं तथा उनका उत्पीड़न किया जाता है । विधवाओं पर होने वाले अत्याचार — भारतीय समाज में विधवाओं की सामाजिक स्थिति अत्यन्त निम्न रही है । हिन्दू समाज में तो स्त्री का पति ही सब कुछ माना जाता है तथा उसे भगवान व देवता तक का पद प्रदान किया जाता है । पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा स्त्री की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो जाती है तथा परिवार और समाज के सदस्य उसे हीन दृष्टि से देखते हैं । उन्हें पुनर्विवाह करने की अनुमति भी प्रदान नहीं की जाती है जिसके कारण उन्हें पति के परिवार में ही अपमानजनक , उपेक्षित , नीरस एवं आर्थिक कठिनाइयों से भरा हुआ जीवन व्यतीत करना पड़ता है । विधवाओं का किसी भी शुभ अवसर पर जाना अपशगुन माना जाता रहा है । इसलिए उन्हें सामाजिक जीवन से अलग – थलग कर दिया जाता रहा है । आज भी उनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है । यद्यपि कानूनी रूप से विधवाओं के पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की गई है , तथापि आज भी इसका प्रचलन अधिक नहीं हो पाया है । राम आहूजा के अनुसार विधवाओं पर अत्याचार करने वाले व्यक्ति पति पक्ष के होते हैं जो उन्हें उनके पतियों की सम्पत्ति से वंचित रखना चाहते हैं । विधवाओं को अपने पतियों के व्यापार आदि के बारे में काफी कम जानकारी होती है । यही अज्ञानता उनके शोषण का प्रमुख कारण बन जाती है । इनका कहना है कि युवा विधवाओं को अधिक अपमान एवं शोषण सहन करना पड़ता है । यद्यपि विधवाओं पर होने वाले अत्याचारों के लिए सम्पत्ति की प्रमुख भूमिका होती है , तथापि विधवाओं की निष्क्रियता एवं बुजदिली भी इसमें सहायक कारक हैं । 

  1. तलाकशुदा स्त्रियों पर होने वाले अत्याच्चार – विवाह – विच्छेद अथवा तलाक भारतीय स्त्रियों की एक प्रमुख समस्या है । परम्परागत रूप से पुरुषों को अपनी पत्नियों को तलाक देने का अधिकार प्राप्त था । मनुस्मृति में कहा गया है कि यदि कोई स्त्री शराब पीती है , हमेशा पीड़ित रहती है , अपने पति की आज्ञा का पालन नहीं करती है तथा धन का सर्वनाश करती है तो मनुष्य को उसके जीवित रहते हुए भी दूसरा विवाह कर लेना चाहिए । पुरुषों की ऐसी स्थिति होने पर स्त्री को उन्हें छोड़ने का अधिकार प्राप्त नहीं था । तलाकशुदा स्त्री को आज भी समाज में एक कलंक माना जाता है तथा हर कोई व्यक्ति उसी को दोष देता है चाहे यह सब उसके शराबी , जुआरी व चरित्रहीन पति के कारण ही क्यों न हुआ हो । उसे सब बुरी नजर से देखते हैं तथा आजीविका का कोई साधन न होने के कारण वह यौन शोषण का शिकार बन जाती है । तलाक के बाद उसके सामने अपना तथा अपने बच्चों का पेट भरने की समस्या उठ खड़ी होती है । समाज के कुछ दलाल ऐसी स्त्रियों को बहका – फुसलाकर वेश्यावृत्ति जैसे अनैतिक कार्य करने पर विवश कर देते हैं । वे बेचारी न चाहती हुई भी अनेक समस्याओं का शिकार हो जाती हैं । 
  2. पत्नी की मार – पिटाई – घरेलू हिंसा का एक अन्य रूप पत्नी के साथ होने वाली मार – पिटाई है । अनेक स्त्रियाँ पति द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के अत्याचारों को चुपचाप सहन करती रहती हैं । पिछले कुछ वर्षों में इस प्रकार की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है यद्यपि इसके बारे में किसी भी प्रकार के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं । राम आहूजा के अनुसार मार – पिटाई की शिकार स्त्रियों की आयु अधिकतर 25 वर्ष से कम होती है । अधिकतर ऐसी घटनाएँ निम्न आय वाले परिवारों में अधिक होती हैं । इसके कारणों का उल्लेख करते हुए आहूजा ने बताया है कि इनमें यौनिक असामंजस्य , भावात्मक अशान्ति , पति का अत्यधिक घमण्डी होना , पति का शराबी होना तथा पत्नी की निष्क्रियता व बुजदिली प्रश्न 3. महिला उत्पीड़न रोकने के लिए कौन – से उपाय किए गए हैं ? उत्तर- भारतीय समाज में महिलाओं के समावेशन और उनके उत्पीड़न को रोकने की प्रक्रिया उपनिवेश काल में प्रारम्भ हो गयी थी , जोकि भारतीय संविधान में दिखाई देती है । गणतन्त्र के लक्ष्यों के अनुरूप सामाजिक विधान तथा कल्याण कार्यक्रम इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं । नागरिक समाज , स्वयंसेवी संगठन तथा नारीवादी संगठन के बराबर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर राज्य पर महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के प्रमुख हैं ।

 

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