सामाजिक परिवर्तन

सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा 

सामाजिक परिवर्तन प्रत्येक समाज की एक आवश्यक विशेषता ही नहीं , बल्कि परिवर्तन के द्वारा ही मानव समाज असभ्यता और बर्बरता के विभिन्न स्तरों को पार करते हुए सभ्यता के वर्तमान स्तर तक पहुँच सका है । यह सच है कि किसी समाज में परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है , जबकि कुछ समाजों में यह गति बहुत तेज हो सकती है । लेकिन संसार का कोई भी समाज ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें परिवर्तन न होता रहा हो । किन्तु किसी समुदाय के लोगों की वेशभूषा , खान – पान , मकानों की बनावट अथवा परिवहन के साधनों में होने वाले विकास को सामाजिक परिवर्तन नहीं कहा जाता । संक्षेप में , सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य लोगों के सामाजिक सम्बन्धों , समाज के ढाँचे अथवा सामाजिक मूल्यों में होने वाले परिवर्तन से है । इसका तात्पर्य यह है कि जब किसी समाज में लोगों की प्रस्थिति और भूमिका , विचार करने के ढंगों तथा जीवन की स्वीकृत विधियों में परिवर्तन होने लगता है , तब इसे हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं । 

अर्थ 

इतिहास , दर्शन , राजनीतिशास्त्र तथा अनेक दूसरे समाज विज्ञानों से सम्बन्धित विद्वानों ने सामाजिक परिवर्तन के अर्थ को अपने – अपने दृष्टिकोण से स्पष्ट किया है । इस दशा में सामाजिक परिवर्तन की वास्तविक अवधारणा को समझने से पहले यह आवश्यक है कि ‘ परिवर्तन ‘ तथा सामाजिक परिवर्तन के अन्तर को स्पष्ट किया जाये । परिवर्तन क्या है ? इसे स्पष्ट करते हुए फिचर ने लिखा है , “ संक्षिप्त शब्दों में , किसी पूर्व अवस्था या अस्तित्व के प्रकार में पैदा होने वाली भिन्नता को ही परिवर्तन कहा जाता है । ” इस कथन के द्वारा फिचर ने यह बताया कि परिवर्तन में तीन प्रमुख तत्त्वों का समावेश होता है- ( 1 ) एक विशेष दशा , ( 2 ) समय तथा ( 3 ) भिन्नता । सर्वप्रथम , जब हम यह कहते हैं कि परिवर्तन हो रहा है तो हमारा उद्देश्य यह स्पष्ट करना होता है कि परिवर्तन किस दशा , वस्तु अथवा तथ्य में हो रहा है । दूसरे , समय के दृष्टिकोण से परिवर्तन एक तुलनात्मक दशा है । किसी वस्तु या दशा में एक समय की तुलना में दूसरे समय पैदा होने वाली नयी विशेषताओं को ही हम परिवर्तन कहते हैं । तीसरे , परिवर्तन का तात्पर्य किसी दशा अथवा वस्तु के रूप में इस तरह भिन्नता उत्पन्न होना है जो उसे पहले की तुलना में एक नया आकार – प्रकार दे दे । सामाजिक परिवर्तन ‘ की अवधारणा परिवर्तन से भिन्न है । संक्षेप में , कहा जा सकता है कि जब दो विशेष अवधियों के बीच व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों , सामाजिक ढाँचे तथा सामाजिक मूल्यों में भिन्नता उत्पन्न होती है , तब इसी भिन्नता को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं । इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध समाज के मुख्यत : निम्नलिखित तीन पक्षों में होने वाले परिवर्तन से होता है ( 1 ) व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन , ( 2 ) समाज की संरचना को बनाने वाली इकाइयों में परिवर्तन तथा ( 3 ) सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन । 

परिभाषाएँ 

सामाजिक परिवर्तन का सही अर्थ क्या है , यह जानने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं का अध्ययन करना होगा । समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है किंग्स्ले डेविस के अनुसार , “ सामाजिक परिवर्तन में केवल वे ही परिवर्तन समझे जाते हैं जो कि सामाजिक संगठन अर्थात् समाज के ढाँचे और कार्य में घटित होते हैं । ” मैकाइवर तथा पेज के अनुसार , “ समाजशास्त्री होने के नाते हमारी विशेष रुचि प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक सम्बन्धों से है । केवल इन सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तन को ही हम सामाजिक परिवर्तन कहते 

सामाजिक परिवर्तन के कारक 

सामाजिक परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारक उत्तरदायी होते हैं 

  1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक – प्राकृतिक या भौगोलिक कारक सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । प्राकृतिक शक्तियाँ समाज के प्रतिमानों के रूपान्तरण में अधिक उत्तरदायी होती हैं । भौगोलिक कारकों में भूमि , आकाश , चाँद – तारे , पहाड़ , नदी , समुद्र , जलवायु , प्राकृतिक घटनाएँ , वनस्पति आदि सम्मिलित हैं । प्राकृतिक कारकों के समग्र प्रभाव को ही प्राकृतिक पर्यावरण कहा जाता है । प्राकृतिक पर्यावरण का मानव – जीवन पर प्रत्यक्ष और गहरा प्रभाव पड़ता है । बाढ़ , भूकम्प व घातक बीमारियाँ मानव सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं । लोग घर – बार छोड़कर अन्यत्र प्रवास कर जाते हैं । नगर और गाँव वीरान हो जाते हैं । लोगों के सामाजिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं । जलवायु सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारक है । जलवायु सभ्यता के विकास और विनाश में प्रमुख भूमिका निभाती है । भौगोलिक कारक ही मनुष्य के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का निर्धारण करते हैं ।
  2. प्राणिशास्त्रीय कारक – प्राणिशास्त्रीय कारक भी सामाजिक परिवर्तन के लिए पूरी तरह उत्तरदायी होते हैं । प्राणिशास्त्रीय कारकों को जैविकीय कारक भी कहा जाता है । प्राणिशास्त्रीय कारक जनसंख्या के गुणात्मक पक्ष को प्रदर्शित करते हैं । इनसे प्रजातीय सम्मिश्रण , मृत्यु और जन्म – दर , लिंग अनुपात और जीवन की प्रत्याशा का बोध होता है । प्रजातीय मिश्रण से व्यक्ति के व्यवहार , मूल्य , आदर्श और विचारों में परिवर्तन आता है । प्रजातीय मिश्रण से समाज की प्रथाएँ , रीति – रिवाज , रहन – सहन का ढंग और सामाजिक सम्बन्ध बदल जाने के कारण सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होता है । जन्म – दर और मृत्यु- दर सदस्यों में सामाजिक अनुकूलन का भाव जगाते हैं । जन्म – दर और मृत्यु – दर में परिवर्तन होने से सामाजिक प्रवृत्तियाँ और मृत्यु – दर अधिक होने से समाज में व्यक्तियों की औसत आयु घट जाती है । समाज में क्रियाशील व्यक्तियों की संख्या घटने से नये आविष्कार बाधित होने लगते हैं । समाज में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक होने पर बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन हो जाता है , इसके विपरीत स्थिति में बहुपति प्रथा चलन में आ जाती है । नयी परम्पराएँ समाज की संरचना और मूल्यों में परिवर्तन उत्पन्न कर सामाजिक परिवर्तन का कारण बनती हैं । 
  3. आर्थिक कारक – सामाजिक परिवर्तन के लिए आर्थिक कारक सबसे अधिक उत्तरदायी हैं । आर्थिक कारक सामाजिक संस्थाओं , परम्पराओं , सामाजिक मूल्यों और रीति – रिवाजों को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं । औद्योगिक विकास ने भारतीय सामाजिक संरचना को आमूल – चूल परिवर्तित कर दिया है । मार्क्स ने वर्ग – संघर्ष तथा भौतिक द्वन्द्ववाद के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करके इसमें आर्थिक कारकों को निर्णायक माना है । मार्क्स का कहना है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति सामाजिक परिवर्तन ‘ की अवधारणा परिवर्तन से भिन्न है । संक्षेप में , कहा जा सकता है कि जब दो विशेष अवधियों के बीच व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों , सामाजिक ढाँचे तथा सामाजिक मूल्यों में भिन्नता उत्पन्न होती है , तब इसी भिन्नता को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं । इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध समाज के मुख्यत : निम्नलिखित तीन पक्षों में होने वाले परिवर्तन से होता है

( 1 ) व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन , 

( 2 ) समाज की संरचना को बनाने वाली इकाइयों में परिवर्तन तथा 

( 3 ) सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन । परिभाषाएँ सामाजिक परिवर्तन का सही अर्थ क्या है , यह जानने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं का अध्ययन करना होगा । समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है किंग्स्ले डेविस के अनुसार , “ सामाजिक परिवर्तन में केवल वे ही परिवर्तन समझे जाते हैं जो कि सामाजिक संगठन अर्थात् समाज के ढाँचे और कार्य में घटित होते हैं । ” मैकाइवर तथा पेज के अनुसार , “ समाजशास्त्री होने के नाते हमारी विशेष रुचि प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक सम्बन्धों से है । केवल इन सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तन को ही हम सामाजिक परिवर्तन कहते सामाजिक परिवर्तन के कारक सामाजिक परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारक उत्तरदायी होते हैं 

  1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक – प्राकृतिक या भौगोलिक कारक सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । प्राकृतिक शक्तियाँ समाज के प्रतिमानों के रूपान्तरण में अधिक उत्तरदायी होती हैं । भौगोलिक कारकों में भूमि , आकाश , चाँद – तारे , पहाड़ , नदी , समुद्र , जलवायु , प्राकृतिक घटनाएँ , वनस्पति आदि सम्मिलित हैं । प्राकृतिक कारकों के समग्र प्रभाव को ही प्राकृतिक पर्यावरण कहा जाता है । प्राकृतिक पर्यावरण का मानव – जीवन पर प्रत्यक्ष और गहरा प्रभाव पड़ता है । बाढ़ , भूकम्प व घातक बीमारियाँ मानव सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं । लोग घर – बार छोड़कर अन्यत्र प्रवास कर जाते हैं । नगर और गाँव वीरान हो जाते हैं । लोगों के सामाजिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं । जलवायु सामाजिक परि वर्तन का प्रमुख कारक है । जलवायु सभ्यता के विकास और विनाश में प्रमुख भूमिका निभाती है । भौगोलिक कारक ही मनुष्य के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का निर्धारण करते हैं । 
  2. प्राणिशास्त्रीय कारक – प्राणिशास्त्रीय कारक भी सामाजिक परिवर्तन के लिए पूरी तरह उत्तरदायी होते हैं । प्राणिशास्त्रीय कारकों को जैविकीय कारक भी कहा जाता है । प्राणिशास्त्रीय कारक जनसंख्या के गुणात्मक पक्ष को प्रदर्शित करते हैं । इनसे प्रजातीय सम्मिश्रण , मृत्यु और जन्म – दर , लिंग अनुपात और जीवन की प्रत्याशा का बोध होता है । प्रजातीय मिश्रण से व्यक्ति के व्यवहार , मूल्य , आदर्श और विचारों में परिवर्तन आता है । प्रजातीय मिश्रण से समाज की प्रथाएँ , रीति – रिवाज , रहन – सहन का ढंग और सामाजिक सम्बन्ध बदल जाने के कारण सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होता है । जन्म – दर और मृत्यु- दर सदस्यों में सामाजिक अनुकूलन का भाव जगाते हैं । जन्म – दर और मृत्यु – दर में परिवर्तन होने से सामाजिक प्रवृत्तियाँ और मृत्यु – दर अधिक होने से समाज में व्यक्तियों की औसत आयु घट जाती है । समाज में क्रियाशील व्यक्तियों की संख्या घटने से नये आविष्कार बाधित होने लगते हैं । समाज में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक होने पर बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन हो जाता है , इसके विपरीत स्थिति में बहुपति प्रथा चलन में आ जाती है । नयी परम्पराएँ समाज की संरचना और मूल्यों में परिवर्तन उत्पन्न कर सामाजिक परिवर्तन का कारण बनती हैं । 
  3. आर्थिक कारक – सामाजिक परिवर्तन के लिए आर्थिक कारक सबसे अधिक उत्तरदायी हैं । आर्थिक कारक सामाजिक संस्थाओं , परम्पराओं , सामाजिक मूल्यों और रीति – रिवाजों को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं । औद्योगिक विकास ने भारतीय सामाजिक संरचना को आमूल – चूल परिवर्तित कर दिया है । मार्क्स ने वर्ग – संघर्ष तथा भौतिक द्वन्द्ववाद के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करके इसमें आर्थिक कारकों को निर्णायक माना है । मार्क्स का कहना है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति

जनसंख्यात्मक कारक प्राकृतिक साधनों से कितनी कर पाएगा , यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रौद्योगिकीय विकास का स्तर क्या है । प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों से विभिन्न वर्गों में पाये जाने वाले आर्थिक सम्बन्ध बदल जाते हैं । आर्थिक सम्बन्ध बदलते ही समाज की सामाजिक संरचना सामाजिक परिवर्तन के कारक परिवर्तित हो जाती है । इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन के लिए मार्क्स ने आर्थिक कारकों की भूमिका को अधिक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक या भौगोलिक कारक प्राणिशास्त्रीय कारक आर्थिक कारक 

  1. सांस्कृतिक कारक – सांस्कृतिक कारक भी सामाजिक सांस्कृतिक कारक विघटन के महत्त्वपूर्ण कारक है । सोरोकिन का मत है कि सांस्कृतिक विशेषताओं में होने वाले परिवर्तन ही सामाजिक प्रौद्योगिकीय कारक परिवर्तन लाने में सक्षम हैं । संस्कृति मानव – जीवन की जीवन – पद्धति है । इसमें रीति – रिवाज , सामाजिक संगठन , आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था , विज्ञान , कला , धर्म , विश्वास , परम्पराएँ , मशीने तथा नैतिक आदर्श सम्मिलित हैं । इसमें समस्त भौतिक और अभौतिक पदार्थ सम्मिलित होते हैं । वास्तव में , संस्कृति वह सीखा हुआ व्यवहार है जो सामाजिक जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने की एक शैली है । जैसे ही समाज के सांस्कृतिक तत्त्वों में परिवर्तन आता है , वैसे ही सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है । वर्तमान में विवाह एक धार्मिक संस्कार न रहकर , समझौता मात्र रह गया है , जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है । बढ़ते हुए विवाह – विच्छेदों के कारण समाज में परिवर्तन आना स्वाभाविक ही है । समाज में सामाजिक मूल्यों , संस्थाओं और प्रथाओं में जैसे ही बदलाव आता है , वैसे ही सांस्कृतिक प्रतिमान बदल जाते हैं और सामाजिक परिवर्तन को जन्म देते हैं । 
  2. जनसंख्यात्मक कारक – जनसंख्या समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है । एक – एक व्यक्ति मिलकर ही समाज बनता है । जनसंख्यात्मक कारक भी सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ; क्योंकि किसी समाज की रचना को जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है । जनसंख्या की रचना , आकार , जन्म – दर , मृत्यु – दर जनसंख्या की कमी एवं अधिकता , देशान्तरगमन , स्त्री – पुरुषों का अनुपात , बालकों , युवकों एवं वृद्धों की संख्या आदि सभी जनसंख्यात्मक कारक माने जाते हैं । 
  3. प्रौद्योगिकीय कारक – वर्तमान युग प्रौद्योगिकी का युग है । नये – नये आविष्कार , उत्पादन की विधियाँ अथवा यन्त्र सामाजिक परिवर्तन लाने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । प्रौद्योगिकी अथवा तकनीकी भी सामाजिक परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण कारक है । जैसे – जैसे किसी समाज की प्रौद्योगिकी में परिवर्तन होते रहते हैं , वैसे – वैसे समाज के विभिन्न पहलुओं तथा संस्थाओं में परिवर्तन होते रहते हैं । वेबलिन ने सामाजिक परिवर्तन लाने में प्रौद्योगिकी को प्रमुख स्थान दिया है । उन्होंने मनुष्यों को आदतों का दास माना है । आदतें स्थिर नहीं होती और प्रौद्योगिकी में परिवर्तन के साथ आदतें भी बदल जाती हैं । इससे सामाजिक परिवर्तन होता है । प्रौद्योगिकी विकास के साथ ही नगरीकरण और औद्योगीकरण की गति तीव्र होती है । बड़े – बड़े नगर तथा औद्योगिक केन्द्र विकसित होने से समाज में अनेक समस्याएँ जन्म लेने लगती हैं , जिससे समाज में परिवर्तन आ जाता है । भौतिकवादी प्रवृत्ति का उदय होने से धन व्यक्ति की प्रतिष्ठा का मापदण्ड बन जाता है । मनोरंजन के साधनों का व्यवसायीकरण होने तथा मानसिक संवेग तनाव और रोग को जन्म देकर सामाजिक परिवर्तन लाते हैं । प्रश्न 2 सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए । सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए । [ सामाजिक परिवर्तन 187 जाए तो ज्ञात होता है कि जब से समाज का प्रादुर्भाव हुआ है , तब से समाज के रीति – रिवाज , परम्पराएँ , रहन – सहन की विधियाँ , पारिवारिक , वैवाहिक व्यवस्थाओं आदि में निरन्तर परिवर्तन होता आया है । इस परिवर्तन के फलस्वरूप ही वैदिक काल के समाज में और वर्तमान समाज में आकाश – पाताल का अन्तर पाया जाता है । वास्तविकता यह है कि मनुष्य की आवश्यकताएँ हमेशा बदलती रहने के कारण वह उसकी पूर्ति के नये – नये तरीके सोचता रहता है । इसके फलस्वरूप उसके कार्य और विचार करने के तरीकों में परिवर्तन होता रहता है । इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया सतत अथवा निरन्तर क्रम में स्वाभाविक रूप से चलती रहती है । सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख सिद्धान्त सामाजिक परिवर्तन के आरम्भिक सिद्धान्तों में उविकास की प्रक्रिया को अधिक महत्त्व दिया गया , जब कि बाद के सामाजिक विचारकों ने रेखीय अथवा चक्रीय आधार पर सामाजिक परिवर्तन की विवेचना की । आज अधिकांश समाजशास्त्री संघर्ष सिद्धान्त के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की विवेचना करने के पक्ष में हैं । वास्तव में , सामाजिक परिवर्तन के बारे में दिये गये सिद्धान्तों की संख्या इतनी अधिक है कि यहाँ पर इन सभी का उल्लेख करना सम्भव नहीं हैं ; अत : हम यहाँ केवल प्रमुख रूप से सामाजिक परिवर्तन के रेखीय और चक्रीय सिद्धान्त का ही वर्णन करेंगे । सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त समाजशास्त्र को जब एक व्यवस्थित विज्ञान के रूप में विकसित करने का कार्य आरम्भ हुआ तो आरम्भिक समाजशास्त्री उद्विकास के सिद्धान्त से अधिक प्रभावित थे । फलस्वरूप कॉम्टे , स्पेन्सर , मॉर्गन , हेनरीमैन तथा वेबलन जैसे अनेक विचारकों ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन एक क्रमिक प्रक्रिया है , जो विकास के अनेक स्तरों में से गुजरती हुई आगे की ओर बढ़ती है । परिवर्तन के इस क्रम में आगे आने वाला प्रत्येक स्तर अपने से पहले के स्तर से अधिक स्पष्ट लेकिन जटिल होता है । दूसरे शब्दों में , सामाजिक परिवर्तन की प्रवृत्ति एक निश्चित दशा में आगे की ओर बढ़ने की होती है । उदाहरण के लिए , समाजशास्त्र के जनक कॉम्टे ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारण मनुष्य के बौद्धिक स्तर अथवा उसके विचारों में परिवर्तन होते रहना है । यह बौद्धिक विकास तीन स्तरों के द्वारा होता है । पहले स्तर में व्यक्ति के , विचार धार्मिक विश्वासों से प्रभावित होते हैं । दूसरे स्तर पर मनुष्य तात्विक अथवा दार्शनिक विधि से विचार करने लगता है । अन्तिम स्तर प्रत्यक्ष अथवा वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर है जिसमें तर्क और अवलोकन की सहायता से विभिन्न घटनाओं के कारणों और परिणामों की व्याख्या की जाने लगती है । इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन ऊपर की ओर उठती हुई एक सीधी रेखा के रूप में होता है । हरबर्ट स्पेन्सर ने भी सामाजिक परिवर्तन को समाज के उद्विकास की चार अवस्थाओं के रूप में स्पष्ट किया । इन्हें स्पेन्सर ने सरल समाज ( Simple Society ) , मिश्रित समाज ( Compound society ) , दोहरे मिश्रित समाज ( Double compound society ) तथा अत्यधिक मिश्रित समाज ( Terribly compound society ) का नाम दिया । समाज की प्रकृति में होने वाले इन प्रारूपों के आधार पर स्पेन्सर ने बताया कि आरम्भिक समाज आकार में छोटे होते हैं , इसके सदस्यों में पारस्परिक सम्बद्धता कम होती है , यह समरूप होते हैं लेकिन लोगों की भूमिकाओं में कोई निश्चित विभाजन नहीं होता । इसके बाद आगे होने वाले प्रत्येक परिवर्तन के साथ समाज का आकार बढ़ने लगता है , सदस्यों में पारस्परिक निर्भरता बढ़ती जाती है , लोगों की प्रस्थिति और भूमिका में एक स्पष्ट अन्तर दिखायी देने लगता है तथा सामाजिक संरचना अधिक व्यवस्थित बनने लगती है । इस तरह समाज में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन सरलता से जटिलता की ओर एक रेखीय क्रम में होता है । मॉर्गन ने मानव सभ्यता के विकास को जंगली युग , बर्बरता का युग तथा सभ्यता का युग जैसे तीन भागों में विभाजित करके स्पष्ट किया । कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार पर तथा वेबलन ने प्रौद्योगिक आधार पर सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये । स्पष्ट है कि जिन सिद्धान्तों के द्वारा सामाजिक परिवर्तन को अनेक स्तरों के माध्यम से विकास की दिशा में होने वाले परिवर्तन के रूप में स्पष्ट किया गया , उन्हें हम परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त कहते हैं । सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त रेखीय सिद्धान्तों के विपरीत सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि सामाजिक परिवर्तन कुछ निश्चित स्तरों के माध्यम से एक विशेष दिशा की ओर नहीं होता बल्कि सामाजिक परिवर्तन

एक चक्र के रूप में अथवा उतार – चढ़ाव की एक प्रक्रिया के रूप में होता है । इतिहास बताता है कि पिछले पाँच हजार वर्षों में संसार में कितनी ही सभ्यताएँ बनी , धीरे – धीरे उनका विकास हुआ , कालान्तर में उनका पतन हो गया तथा इसके बाद अनेक सभ्यताएँ एक नये रूप में फिर से विकसित हो गयीं । सभ्यता की तरह सांस्कृतिक विशेषताओं में होने वाले परिवर्तन भी उतार – चढ़ाव की एक प्रक्रिया के रूप में होते हैं । एक समय में जिन व्यवहारों , मूल्यों तथा विश्वासों को बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाता है , कुछ समय बाद उन्हें अनुपयोगी और रूढ़िवादी समझकर छोड़ दिया जाता है तथा अनेक ऐसे सांस्कृतिक प्रतिमान विकसित होने लगते हैं जिनकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी नहीं की गयी थी । इसका तात्पर्य है कि जिस तरह मनुष्य का जीवन जन्म , बचपन , युवावस्था , प्रौढ़ावस्था और मृत्यु के चक्र से गुजरता है , उसी तरह विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी एक चक्र के रूप में उत्थान और पतन होता रहता है । यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ऋतुओं अथवा मनुष्य के जीवन से सम्बन्धित परिवर्तन जिस तरह एक निश्चित चक्र के रूप में होते हैं , समाज में होने वाले परिवर्तन सदैव एक गोलाकार चक्र के रूप में नहीं होते । जिन सामाजिक प्रतिमानों , विचारों , विश्वासों तथा व्यवहार के तरीकों को हम एक बार छोड़ देते हैं , समय बीतने के साथ हम उनमें से बहुत – सी विशेषताओं को फिर ग्रहण कर सकते हैं , लेकिन उनमें कुछ संशोधन अवश्य हो जाता है । इस दृष्टिकोण से अधिकांश सामाजिक परिवर्तन घड़ी के पैण्डुलम की तरह होते हैं जो दो छोरों अथवा सीमाओं के बीच अपनी जगह निरन्तर बदलते रहते हैं । स्पेंग्लर , पैरेटो , सोरोकिन तथा टॉयनबी वे प्रमुख विचारक है जिन्होंने सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये । प्रश्न 3. सामाजिक परिवर्तन का क्या अर्थ है ? सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारकों की भूमिका स्पष्ट कीजिए । ( ( 2009 , 10 , 13 ) सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न सांस्कृतिक दशाओं का विवेचन कीजिए । ( 2012 , 17 ) उत्तर- सामाजिक परिवर्तन के अनेक कारक हैं । इनमें से एक सांस्कृतिक कारक अथवा सांस्कृतिक दशाएँ हैं । अनेक विद्वानों ने एक तर्क दिया है कि सांस्कृतिक कारक सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । इन विद्वानों में मैक्स वेवर , स्पेंग्लर तथा सोरोकिन प्रमुख है । सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारकों की भूमिका सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारकों की भूमिका को निम्नलिखित विद्वानों के विचारानुसार स्पष्ट किया जा सकता है ( क ) मैक्स वैबर या मैक्स वैबर ने संस्कृति एवं धर्म के सम्बन्ध को व्यक्त करने के लिए संसार के सभी प्रमुख धर्मों का अध्ययन किया । इन धर्मों में ईसाई धर्म की एक प्रमुख शाखा प्रोटेस्टैण्ट धर्म का उसने विशेष रूप से अध्ययन किया और उसी के आधार पर मैक्स वेबर ने यह निष्कर्ष निकाला कि धर्म का सामाजिक व्यवस्था विशेष रूप से आर्थिक संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ता है । इस सम्बन्ध में मैक्स वेबर ने पूँजीवाद का प्रोटेस्टैण्ट धर्म से सम्बन्ध स्थापित किया । मैक्स वैबर ने अपने सिद्धान्त में यह दिखाया है कि प्रोटेस्टैण्ट धर्म में पूँजीवाद को प्रोत्साहित करने वाले तत्त्व निहित हैं । इस प्रकार के तत्त्व अन्य धर्मों में नहीं पाए जाते । इसलिए पूँजीवाद की भावना का विकास केवल पश्चिमी यूरोप के देशों में ही हुआ यहाँ पर प्रोटैस्टैण्ट लोगों की संख्या अधिक है । मैक्स वैबर के अनुसार धर्म व संस्कृति ही यह निश्चय करते हैं कि देश में किस प्रकार की प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन मिलता ( ख ) स्पेग्लर स्पेंग्लर ने अपनी पुस्तक ‘ दि डिक्लाइन ऑफ दि वेस्ट ‘ ( The decline of the waste ) में लिखा है कि ऋतुओं की भाँति ही विश्व की संस्कृति समय – समय पर परिवर्तित होती रहती है । यह परिवर्तन कुछ निश्चित नियमों के अनुसार ऋतुओं की भाँति चक्रवत् होता रहता है । इसी परिवर्तन के कारण सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है । एक संस्कृति के बाद दूसरी संस्कृति आती है और उससे पूर्व संस्कृति के नियमों में परिवर्तन हो जाता है । इस परिवर्तन का क्रम चक्रवत् चलता रहता है और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया भी सदैव चलती रहती है ।

सामाजिक परिवर्तन 89 ( ग ) सोरोकिन सोरोकिन ने संस्कृति को ही सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण माना है । उनका कहना है कि जो लोग सैदव ऊर्ध्वगामी विकास देखते हैं , वे सही नहीं हैं ; और न ही वे व्यक्ति सही है जो सामाजिक परिवर्तन को चक्रीय गति से देखते हैं । सामाजिक परिवर्तन की गति चक्रीय तो है परन्तु वास्तव में यह सांस्कृतिक तत्त्वों के उतार – चढ़ाव के कारण होता है । उसका विचार है कि संस्कृति दो प्रकार की होती है – प्रथम चेतनात्मक संस्कृति है , जिसमें भौतिक सुख को प्रदान करने वाले आविष्कार व उपकरणों को महत्त्व दिया जाता है । ये संस्कृति के भौतिक तथा मूर्त पक्ष है जिनको हम चेतनात्मक संस्कृति के नाम से पुकारते हैं । संस्कृति के दूसरे स्वरूप को सोरोकिन विचारात्मक संस्कृति के नाम से पुकारता है । इसमें भौतिक समृद्धि की अपेक्षा आध्यात्मिक विकास पर अधिक बल दिया जाता है । संस्कृति का यह अभौतिक तथा अमूर्त पक्ष होता है जिसका सम्बन्ध हमारे विचारों , हमारी भावनाओं से होता है । सोरोकिन का मत है कि इन दोनों प्रकार की संस्कृतियों में उतार – चढ़ाव होता रहता है । कभी चेतनात्मक संस्कृति ऊपर उन्नति की ओर पहुँचती है और फिर विचारात्मक संस्कृति की ओर झुक जाती है । इन दोनों संस्कृतियों के बीच उतार – चढ़ाव की प्रक्रिया से सामाजिक परिवर्तन का जन्म होता है । सोरोकिन का मत है कि दोनों प्रकार की संस्कृतियों में से जब कोई भी संस्कृति अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है तो वह और आगे न बढ़कर पुनः पीछे की ओर लौटने लगती । आज हम भौतिकवाद की चरम सीमा पर हैं किन्तु व्यक्ति बनाव – सिंगार से तंग आकर सरल जीवन तथा सादगी की ओर बढ़ता नजर आता है । आविष्कारों के भयंकर परिणामों से तंग आकर विश्व शान्ति के प्रयासों को तीव्र करने के लिए विविध प्रकार के संगठनों का निर्माण होने लगा है । इन सब बातों से यही निष्कर्ष निकलता है कि एक चरम सीमा के बिन्दु पर पहुँचकर कोई भी संस्कृति पीछे की ओर लौटती है । संस्कृति तथा सामाजिक परिवर्तन के सम्बन्ध में उपर्युक्त विद्वानों के विचारों की विवेचना के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संस्कृति सामाजिक परिवर्तन की दिशा को निश्चित करती है । संस्कृति इस बात को निर्धारित करती है कि कौन – सा आविष्कार किस सीमा तक लोकप्रिय होगा । जो आविष्कार सांस्कृतिक तत्त्वों के अनुरूप नहीं होते हैं उनको समाज में सफलता नहीं मिलती है । प्रश्न 4. ऑगबर्न के सांस्कृतिक विलम्बना के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए । ( सांस्कृतिक विलम्बना पर एक लेख लिखिए । ( सांस्कृतिक विलम्बना की अवधारणा की विस्तृत व्याख्या कीजिए । ( उत्तर ऑगबन का सांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धान्त विलियम एफ ० ऑगबर्न ( W.E.ogburn ) ने संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन के सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए सर्वप्रथम 1922 ई ० में अपनी पुस्तक ‘ Social Change ‘ में ‘ सांस्कृतिक पिछड़ ‘ अथवा ‘ सांस्कृतिक विलम्बना ‘ के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया । आपके अनुसार , संस्कृति का तात्पर्य मनुष्य द्वारा निर्मित सभी प्रकार के भौतिक और अभौतिक ( Material and non – material ) तत्त्वों से है । lag ‘ का तात्पर्य ‘ लँगड़ाना ‘ अथवा पीछे रह जाना होता है । इस प्रकार संस्कृति के भौतिक पक्ष की तुलना में जब अभौतिक पक्ष पीछे रह जाता है , तब सम्पूर्ण संस्कृति में असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । इसी स्थिति को हम ‘ सांस्कृतिक विलम्बना ‘ अथवा ‘ सांस्कृतिक पिछड़ ‘ कहते हैं । यही स्थिति सामाजिक परिवर्तन का आधारभूत कारण है । ऑगबर्न ने स्वयं इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है , आधुनिक संस्कृति के विभिन्न भाग समान गति से नहीं बदल रहे हैं , कुछ भागों में दूसरी की अपेक्षा अधिक तेजी से परिवर्तन हो रहा है और क्योंकि संस्कृति के सभी भाग एक – दूसरे पर निर्भर और एक – दूसरे से सम्बन्धित होते हैं , इसलिए संस्कृति के एक भाग में होने वाले तीव्र परिवर्तन से दूसरे भागों में भी अभियोजन की आवश्यकता हो जाती है । ” ऑगबन का तर्क है कि संस्कृति के विभिन्न भागों में होने वाले परिवर्तनों की असमान दर ही सांस्कृतिक पिछड़ का कारण है । हम किसी भी प्रगतिशील अथवा आदिम समाज का उदाहरण क्यों न ले लें , अधिकांश आधुनिक समाजों में हमें यह स्थिति देखने को मिलती है । एक ओर हमारी भौतिक संस्कृति में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गये है – हम आधुनिक ढंगों से खेती करते हैं , मशीनों के द्वारा उत्पादन कार्य करते है , चिकित्सा विज्ञान की प्रगति से मृत्यु को भी कुछ समय तक रोकने में समर्थ हो गये हैं , परिवहन के साधनों से हजारों मील की दूरी कुछ घण्टों में ही तय करने लगे हैं और संचार के साधनों से हजारों मील दूर की आवाज को कुछ ( 2009 , 11 ) ( 2013 ) या या

सेकण्डों में ही सुन सकते हैं , लेकिन दूसरी ओर , हमारे विश्वास और लोकाचार आज भी हजारों वर्ष पुराने हैं । व्यक्ति कितना ही प्रगतिशील और शिक्षित क्यों न हो गया हो , वह काली बिल्ली द्वारा रास्ता काटे जाने अथवा टूटे हुए शीशे को देखना अशुभ समझता है और पित – आत्माओं की तृप्ति के लिए कुछ व्यक्तियों को भोजन कराने में विश्वास करता है । इसी प्रकार हजारों विश्वास हमारे जीवन को आज भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रभावित कर रहे हैं । सन् 1947 में अपनी एक अन्य पुस्तक AHandbook of Sociology में ऑगबन ने ‘ सांस्कृतिक पिछड़ ‘ की परिभाषा में कुछ संशोधन करते हुए कहा है कि ” सांस्कृतिक पिछड़ वह तनाव है जो तीव्र और असमान गति से परिवर्तन होने वाली संस्कृति के दो परस्पर सम्बन्धित भागों में विद्यमान होता है । ” इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि भौतिक संस्कृति की अपेक्षा अभौतिक संस्कृति में होने वाले कम परिवर्तन को ही हम ‘ सांस्कृतिक पिछड़ ‘ नहीं कहते , बल्कि संस्कृति के दोनों भागों में से किसी भी एक भाग के दूसरे से आगे निकल जाने की स्थिति को सांस्कृतिक पिछड़ कहा जाता है । उदाहरण के लिए , हम भारतीय समाज को ले सकते हैं , जहाँ नगरों और ग्रामीण समुदायों में यह स्थिति भिन्न – भिन्न रूपों में पायी जाती है । नगरों में भौतिक संस्कृति अभौतिक संस्कृति की अपेक्षा बहुत आगे है , जबकि ग्रामीण समुदाय में भौतिक संस्कृति की अपेक्षा अभौतिक संस्कृति का महत्त्व कहीं अधिक है । सांस्कृतिक विलम्बना के कारण तथा परिणाम सांस्कृतिक विलम्बना के सिद्धान्त में ऑगबर्न ने इस तथ्य को भी स्पष्ट किया कि संस्कृति के भौतिक तथा अभौतिक पक्षों के बीच यह असन्तुलन क्यों पैदा होता है तथा सांस्कृतिक विलम्बना की दशा से सम्बन्धित कौन – से परिणाम सामाजिक परिवर्तन को जन्म देते हैं ? जहाँ तक सांस्कृतिक विलम्बना के कारण का प्रश्न . है , इसे निम्नलिखित पाँच प्रमुख दशाओं के आधार पर समझा जा सकता है 1. रूढ़िवादी मनोवृत्तियाँ संस्कृति के अभौतिक पक्ष में परिवर्तन लाने में बाधक होती हैं । अधिकांश व्यक्ति नयी प्रौद्योगिकी को आसानी से ग्रहण कर लेते हैं , लेकिन वे अपने विचारों , विश्वासों तथा सामाजिक मूल्यों को बदलना नहीं चाहते । 2. अधिकांश लोगों में नये विचारों या नयी वस्तु के प्रति भय की भावना होती है । 3. अतीत के प्रति निष्ठा होने के कारण हम प्रत्येक उस व्यवहार अथवा विचार को अधिक अच्छा समझते हैं जिनको परम्पराओं के रूप में हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित किया जाता है । 4. समाज के कुछ विशेष वर्गों के निहित स्वार्थ ( Vested interests ) भी संस्कृति के भौतिक तथा अभौतिक पक्ष के बीच पैदा होने वाले सन्तुलन का एक प्रमुख कारण है । समाज का पूँजीपति वर्ग , बुद्धजीवी वर्ग तथा अधिकारी वर्ग आने – अपने स्वार्थों के कारण अक्सर नयी प्रौद्योगिकी , नवाचारों , व्यवहार के नये तरीकों अथवा नये विचारों का इसलिए विरोध करता है जिससे उसका पारम्परिक महत्त्व कम न हो जाए । 5. नये विचारों की परीक्षा में कठिनता होने के कारण उनकी उपयोगिता की जाँच करना भी अक्सर सम्भव नहीं हो पाता । यही दशाएँ संस्कृति के विभिन्न पक्षों में असन्तुलन पैदा करती हैं । किसी समाज में जब सांस्कृतिक विलम्बना की दशा उत्पन्न होती है , तब इसके अनेक परिणाम स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं । जब संस्कृति का एक पक्ष दूसरे से पिछड़ जाता है , तब व्यक्तियों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपनी दशाओं से नये सिरे से अनुकूलन करें । इसके फलस्वरूप परम्परागत संस्थाओं के कार्य दूसरी संस्थाओं को हस्तान्तरित होने लगते है । यही दशा सांस्कृतिक मूल्यों के प्रभाव में कमी पैदा करती है । यदि सांस्कृतिक विलम्बना की दशा लम्बे समय तक बनी रहती है तो सामाजिक सन्तुलन बिगड़ जाने के कारण सामाज्पिक समस्याओं में वृद्धि होने लगती है । ये सभी दशाएँ सामाजिक परिवर्तन में वृद्धि करती है । सिद्धान्त की समालोचना यद्यपि यह सच है कि संस्कृति के सभी भाग समान गति से नहीं बदलते , लेकिन जिस रूप में ऑगबर्न ने ‘ सांस्कृतिक पिछड़ ‘ का सिद्धान्त प्रस्तुत किया है , उसमें बहुत – सी कमियाँ हैं 1. यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि अभौतिक संस्कृति की तुलना में भौतिक संस्कृति सदैव ही आगे बढ़ जाती है । मैक्स मूलर जैसे प्रसिद्ध विद्वान् ने भारत का उदाहरण देते हुए बताया है कि भारत ज्ञान और

सामाजिक परिवर्तन 191 या त्याग में अत्यधिक प्रगतिशील है , जबकि भौतिक संस्कृति का यहाँ न तो अधिक महत्त्व है और न ही इस क्षेत्र में प्रगति करने का प्रयल किया जा सकता है । 2. ऑगबर्न ने ‘ सांस्कृतिक पिछड़ ‘ को ही सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र कारण मान लिया है , लेकिन यह सदैव सत्य नहीं है । मैकाइवर का कथन है कि संस्कृति का असन्तुलन सदैव भौतिक और अभौतिक पक्षों के बीच में नहीं होता बल्कि संस्कृति के एक पक्ष में ही सन्तुलन की स्थिति हो सकती है । 3. कभी – कभी अभौतिक और भौतिक संस्कृति के विकास की दर में ही भिन्नता होने से ‘ सांस्कृतिक पिछड़ की स्थिति उत्पन्न नहीं होती , बल्कि अभौतिक संस्कृति के विभिन्न अंगों का असन्तुलन भी ‘ पिछड़ ‘ की स्थिति उत्पन्न करता है । उदाहरण के लिए , हम एक समय पर यह विश्वास दिलाते हैं कि दहेज – प्रथा असंगत और असामयिक है और दूसरे समय पर हम स्वयं दहेज लेते और देते हैं । हम अन्धविश्वासों की आलोचना करते हैं और स्वयं ही अन्धविश्वासों के अनुसार व्यवहार करते हैं । इस स्थिति में हम अभौतिक संस्कृति में होने वाले परिवर्तन की वास्तविक सीमा को नहीं समझ पाते । 4. हमारे सामने मुख्य कठिनाई यह आती है कि संस्कृति के अभौतिक पक्ष में होने वाले परिवर्तनों को किस प्रकार मापा जाए ? भौतिक वस्तुओं के परिवर्तनों को हम माप सकते हैं लेकिन अभौतिक पक्ष से सम्बन्धित परिवर्तन का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है । इस प्रकार भौतिक संस्कृति के तनिक – से परिवर्तन को प्रगति कह देना और अभौतिक संस्कृति में अनेक परिवर्तनों के बाद भी उसे ‘ स्थायी ‘ मान लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है । 5. ऑगबर्न के इस सिद्धान्त का एक बड़ा दोष यह है कि आपने इस सिद्धान्त को केवल पश्चिमी समाज की परिस्थितियों में ही प्रस्तुत किया है । इस प्रकार यदि हम कहें कि आपने केवल औद्योगीकरण को ही अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र कारक मान लिया है तो यह गलत नहीं होगा । प्रश्न 5. सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए । सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त का वर्णन कीजिए । ( 2012 , 16 ) सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त की विवेचना कीजिए । ( 2012 , 14 ) ‘ सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है । स्पष्ट करते हुए इसके चक्रीय सिद्धान्त की विवेचना कीजिए । ( सामाजिक परिवर्तन के किसी एक चक्रीय सिद्धान्त का वर्णन कीजिए । ( सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए । ( उत्तर सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है । असभ्यता और बर्बरता के युग में जब मानव का जीवन पूरी तरह प्राकृतिक था , तब भी समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रही । यदि संसार के इतिहास को उठाकर देखा जाए तो ज्ञात होता है कि जब से समाज का प्रादुर्भाव हुआ है , तब से समाज के रीति – रिवाज , परम्पराएँ , रहन – सहन की विधियाँ , पारिवारिक , वैवाहिक व्यवस्थाओं आदि में निरन्तर परिवर्तन होता आया है । इस परिवर्तन के फलस्वरूप ही वैदिक काल के समाज में और वर्तमान समाज में आकाश – पाताल का अन्तर पाया जाता है । वास्तविकता यह है कि मनुष्य की आवश्यकताएँ हमेशा बदलती रहने के कारण वह उसकी पूर्ति के नये – नये तरीके सोचता रहता है । इसके फलस्वरूप उसके कार्य और विचार करने के तरीकों में परिवर्तन होता रहता है । इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया सतत अथवा निरन्तर क्रम में स्वाभाविक रूप से चलती रहती है । सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख सिद्धान्त सामाजिक परिवर्तन के आरम्भिक सिद्धान्तों में उद्विकास की प्रक्रिया को अधिक महत्त्व दिया गया , जबकि बाद के सामाजिक विचारकों ने रेखीय अथवा चक्रीय आधार पर सामजिक परिवर्तन की विवेचना की । आज अधिकांश समाजशास्त्री संघर्ष सिद्धान्त के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की विवेचना करने के पक्ष में हैं । वास्तव में , सामाजिक परिवर्तन के बारे में दिये गये सिद्धान्तों की संख्या इतनी अधिक है कि यहाँ पर इन सभी का उल्लेख करना सम्भव नहीं है ; अत : हम यहाँ केवल प्रमुख रूप से सामाजिक परिवर्तन के रेखीय और चक्रीय सिद्धान्त का ही वर्णन करेंगे ।

सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त समाजशास्त्र को जब एक व्यवस्थित विज्ञान के रूप में विकसित करने का कार्य आरम्भ हुआ तो आरम्भिक समाजशास्त्री उद्विकास के सिद्धान्त से अधिक प्रभावित थे । फलस्वरूप कॉम्टे , स्पेन्सर , मॉर्गन , हेनरीमैन तथा वेबलन जैसे अनेक विचारकों ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन एक क्रमिक प्रक्रिया है , जो विकास के अनेक स्तरों में से गुजरती हुई आगे की ओर बढ़ती है । परिवर्तन के इस क्रम में आगे आने वाला प्रत्येक स्तर अपने से पहले के स्तर से अधिक स्पष्ट लेकिन जटिल होता है । दूसरे शब्दों में , सामाजिक परिवर्तन की प्रवृत्ति एक निश्चित दशा में आगे की ओर बढ़ने की होती है । उदाहरण के लिए , समाजशास्त्र के जनक कॉम्टे ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारण मनुष्य के बौद्धिक स्तर अथवा उसके विचारों में परिवर्तन होते रहना है । यह बौद्धिक विकास तीन स्तरों के द्वारा होता है । पहले स्तर में व्यक्ति के विचार धार्मिक विश्वासों से प्रभावित होते हैं । दूसरे स्तर पर मनुष्य तात्विक अथवा दार्शनिक विधि से विचार करने लगता है । अन्तिम स्तर प्रत्यक्ष अथवा वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर है जिसमें तर्क और अवलोकन की सहायता से विभिन्न घटनाओं के कारणों और परिणामों की व्याख्या की जाने लगती है । इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन ऊपर की ओर उठती हुई एक सीधी रेखा के रूप में होता है । हरबर्ट स्पेन्सर ने भी सामाजिक परिवर्तन को समाज के उविकास की चार अवस्थाओं के रूप में स्पष्ट किया । इन्हें स्पेन्सर ने सरल समाज ( Simple society ) , मिश्रित समाज ( Compound society ) , दोहरे मिश्रित समाज ( Double compound society ) तथा अत्यधिक मिश्रित समाज ( Terribly compound society ) का नाम दिया । समाज की प्रकृति में होने वाले इन प्रारूपों के आधार पर स्पेन्सर ने बताया कि आरम्भिक समाज आकार में छोटे होते हैं , इसके सदस्यों में पारस्परिक सम्बद्धता कम होती है , यह समरूप होते हैं लेकिन लोगों की भूमिकाओं में कोई निश्चित विभाजन नहीं होता । इसके बाद आगे होने वाले प्रत्येक परिवर्तन के साथ समाज का आकार बढ़ने लगता है , सदस्यों में पारस्परिक निर्भरता बढ़ती जाती है , लोगों की प्रस्थिति और भूमिका में एक स्पष्ट अन्तर दिखायी देने लगता है तथा सामाजिक संरचना अधिक व्यवस्थित बनने लगती है । इस तरह समाज में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन सरलता से जटिलता की ओर एक रेखीय क्रम में होता है । मॉर्गन ने मानव – सभ्यता के विकास को जंगली युग , बर्बरता का युग तथा सभ्यता का युग जैसे तीन भागों में विभाजित करके स्पष्ट किया । कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार पर तथा वेबलन ने प्रौद्योगिक आधार पर सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये । स्पष्ट है कि जिन सिद्धान्तों के द्वारा सामाजिक परिवर्तन को अनेक स्तरों के माध्यम से विकास की दिशा में होने वाले परिवर्तन के रूप में स्पष्ट किया गया , उन्हें हम परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त कहते हैं । सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त रेखीय सिद्धान्तों के विपरीत सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त इस मान्यता पर 3 धारित हैं कि सामाजिक परिवर्तन कुछ निश्चित स्तरों के माध्यम से एक विशेष दिशा की ओर नहीं होता बल्कि सामाजिक परिवर्तन एक चक्र के रूप में अथवा उतार – चढ़ाव की एक प्रक्रिया के रूप में होता है । इतिहास बताता है कि पिछले पाँच हजार वर्षों में संसार में कितनी ही सभ्यताएँ बनी , धीरे – धीरे उनका विकास हुआ , कालान्तर में उनका पतन हो गया तथा इसके बाद अनेक सभ्यताएँ एक नये रूप में फिर से विकसित हो गयीं । सभ्यता की तरह सांस्कृतिक विशेषताओं में होने वाले परिवर्तन भी उतार – चढ़ाव की एक प्रक्रिया के रूप में होते हैं । एक समय में जिन व्यवहारों , मूल्यों तथा विश्वासों को बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाता है , कुछ समय बाद उन्हें अनुपयोगी और रूढ़िवादी समझकर छोड़ दिया जाता है तथा अनेक ऐसे सांस्कृतिक प्रतिमान विकसित होने लगते हैं जिनकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी नहीं की गयी थी । इसका तात्पर्य है कि जिस तरह मनुष्य का जीवन जन्म , बचपन , युवावस्था , प्रौढ़ावस्था और मृत्यु के चक्र से गुजरता है , उसी तरह विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी एक चक्र के रूप में उत्थान और पतन होता रहता है । यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ऋतुओं अथवा मनुष्य के जीवन से सम्बन्धित परिवर्तन जिस तरह एक निश्चित चक्र के रूप में होते हैं , समाज में होने वाले परिवर्तन सदैव एक गोलाकार चक्र के रूप में नहीं होते । जिन सामाजिक प्रतिमानों , विचारों , विश्वासों तथा व्यवहार के तरीकों को हम एक बार छोड़ देते हैं , समय बीतने के साथ हम उनमें से बहुत – सी विशेषताओं को फिर ग्रहण कर सकते है , लेकिन उनमें कुछ संशोधन अवश्य हो जाता है । इस दृष्टिकोण से अधिकांश सामाजिक परिवर्तन घड़ी के पैण्डुलम की तरह होते हैं जो दो छोरों अथवा सीमाओं के बीच अपनी जगह निरन्तर बदलते रहते हैं । स्पेंग्लर , पैरेटो , सोरोकिन तथा टॉयनबी वे प्रमुख विचारक है जिन्होंने सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये । .

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