सामाजिक समूह : प्राथमिक एवं द्वितीय समूह

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द्वितीयक समूह की उपयोगिता की विवेचना कीजिए

विशेषीकरण को प्रोत्साहन

वर्तमान युग श्रम – विभाजन और विशेषीकरण को सबसे अधिक महत्त्व देता है । विशेषीकरण की योजना व्यक्ति को द्वितीयक समूहों से ही प्राप्त होती है , क्योंकि द्वितीयक समूहों की प्रकृति अपने आप में विशेषीकृत होती है । उदाहरण के लिए , एक प्राथमिक समूह अपने किसी सदस्य को एक कुशल नेता , डॉक्टर , प्रोफेसर अथवा अभिनेता नहीं बना सकता । व्यक्ति को ये स्थितियाँ केवल द्वितीयक समूह ही प्रदान कर सकते हैं 

सामाजिक परिवर्तन द्वारा प्रगति

द्वितीयक समूह व्यक्ति को भविष्य के प्रति आशावान बनाकर परिवर्तन को प्रोत्साहन देते हैं । वास्तविकता यह है कि हमारे समाज में आज यदि प्रथाओं , परम्पराओं , रूढ़ियों और अन्धविश्वासों का प्रभाव कुछ कम हो सका है तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि द्वितीयक समूहों ने हमें नये व्यवहारों को ग्रहण करने की प्रेरणा दी है। 

जागरूकता में वृद्धि

द्वितीयक समूह परम्परा पर आधारित न होकर विवेक और तर्क को अधिक महत्त्व देते हैं । इस कारण इन समूहों में रहकर व्यक्ति का दृष्टिकोण अधिक तार्किक बन जाता है । आज द्वितीयक समूहों के प्रभाव से ही अनेक उपनिवेशवादी समाजों को अपनी दमनकारी नीति को छोड़ना पड़ा है । इसके अतिरिक्त , स्त्रियों की वर्तमान उन्नति और श्रमिक वर्ग को प्राप्त होने वाले अधिकार भी द्वितीयक समूहों के कारण ही सम्भव हो सके हैं ।

आवश्यकताओं की पूर्ति

औद्योगीकरण के युग में व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति केवल द्वितीयक समूह में रहकर ही सम्भव है । वर्तमान युग में कार्य करना आवश्यक हो गया है । उदाहरण के लिए , शिक्षा प्राप्त करना , किसी कारखाने या कार्यालय में नौकरी करना , राजनीतिक संगठनों से सम्बन्ध बनाये रखना , अनेक कल्याण संगठनों में रहकर कार्य करना , स्थानीय अथवा राष्ट्रीय मामलों में रुचि लेना आदि व्यक्ति की प्रमुख आवश्यकताएँ हैं । इन सभी आवश्यकताओं को केवल द्वितीयक समूह ही पूरा करते हैं। 

श्रम को प्रोत्साहन

द्वितीयक समूहों ने श्रम को सर्वोच्च मानवीय मूल्य के रूप में स्वीकार करके सामाजिक प्रगति में विशेष योगदान दिया है । द्वितीयक समूह व्यक्ति को श्रम का वास्तविक पुरस्कार देकर उसे अधिक से अधिक काम करने की प्रेरणा देते हैं । इससे व्यक्ति का जीवन कर्मठ बनता है ।

सामाजिक समूह के प्रकार लिखिए

उत्तर- समनर के द्वारा सामाजिक समूह को दो भागों में बाँटा गया है

अन्तः समूह – अन्त : समूह का तात्पर्य उस समूह से है , जिसके प्रति लोगों में हम की भावना पाई जाती है । इस भावना के साथ – साथ व्यक्तियों में यह विचार उत्पन्न होने लगता है कि यह मेरा समूह है और इसके समस्त सदस्य मेरे आत्मीय और हितैषी हैं । अन्तःसमूह के किसी एक सदस्य के सुखी या दुःखी होने पर समूह के सभी सदस्य कुछ हद तक सुखी या दुःखी हुआ करते हैं । अन्त : समूह के सदस्यों में अपने समूह के साथ पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण भी पाया जाता है । अपने समूह को उच्च या महान् माना जाता है तथा अन्य समूहों को निम्न या हीन माना जाता है । अन्तःसमूहों के सदस्यों में आमने सामने का सम्बन्ध होता है । परिवार , मित्र – मण्डली अन्त : समूहों के प्रमुख उदाहरण हैं । सामान्य रूप से अन्तःसमूहों के सदस्यों की संख्या बहुत अधिक नहीं होती 

बाहासमूह ( Out – group ) – बाह्यसमूह अन्त : समूह के विपरीत विशेषताओं वाले समूह होते हैं । व्यक्ति जहाँ अन्त : समूह के प्रति प्रेम – भावना रखता है , वहीं बाह्यसमूह के प्रति द्वेष और घृणा की भावना रखता है । बाह्यसमूह के प्रति उदासीन तथा निषेधात्मक दृष्टिकोण होता है । अत : हम जिस समूह के सदस्य नहीं होते तथा जिस समूह के प्रति ‘ हम की भावना नहीं पाई जाती , वह समूह हमारे लिए बाह्यसमूह होता है । शत्रु सेना , अन्य गाँव आदि इसके उदाहरण हैं। 

प्राथमिक समूह की विशेषताएँ 

प्राथमिक समूह को पूरी तरह से समझ लेने के लिए उनकी विशेषताओं से परिचित होना अनिवार्य है । प्राथमिक समूह में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं 

शारीरिक समीपता – सदस्यों के मध्य निकटता और शारीरिक समीपता होना प्राथमिक समूहों की प्रमुख विशेषता है । शारीरिक समीपता के कारण ही प्राथमिक समूह के सदस्यों के मध्य आमने – सामने के सम्बन्ध पाये जाते हैं । प्राथमिक समूह के सदस्यों में अपनापन पाया जाता है ; अत : यह समूह अधिक स्थायित्व लिए होता है । 

लघु आकार – प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाये जाते हैं। प्रत्यक्ष सम्बन्ध तभी स्थापित हो सकते हैं जब समूह का आकार बहुत छोटा हो । प्राथमिक समूह के सदस्य एक – दूसरे से परिचित होते हैं तथा समीप रहते हैं। 

सम्बन्धों की घनिष्ठता – प्राथमिक समूह के सदस्यों के मध्य पाये जाने वाले सम्बन्ध बड़े घनिष्ठ होते हैं । इनके सम्बन्धों में निरन्तरता और स्थिरता होने के कारण घनिष्ठता पनप जाती है। 

समान उद्देश्य – प्राथमिक समूह के सदस्य समान उद्देश्यों के कारण परस्पर जुड़े रहते हैं । एक निवास स्थान और एक जैसी संस्कृति उनमें समरूपता भर देती है , जिससे उनके उद्देश्य एकसमान हो जाते हैं । प्राथमिक समूह के सदस्य सबके हित की सोचते हैं । त्याग और बलिदान की भावना उन्हें व्यक्तिगत स्वार्थ त्यागकर समूह के हित में कार्य करने को विवश कर देती है।

हम की भावना – प्राथमिक समूह एक लघु समूह है । उनके सदस्यों में निकटता के कारण घनिष्ठता पायी जाती है । परस्पर घनिष्ठता उनमें ‘ हम ‘ की भावना का संचार कर देती है।

स्वाभाविक सम्बन्ध – प्राथमिक समूह के सदस्यों के मध्य में प्राथमिक समूह की विशेषताएँ स्वैच्छिक सम्बन्ध पाये जाते हैं । ये सम्बन्ध स्वत : उत्पन्न होते हैं , उनके मध्य कोई शर्त नहीं रहती।

स्वतः विकास – प्राथमिक समूह का निर्माण न होकर स्वत : • समान उद्देश्य विकास होता है । इनके निर्माण में कोई शक्ति या दबाव काम नहीं करता , वरन् ये स्वाभाविक रूप से स्वत : विकसित हो जाते हैं । . स्वाभाविक सम्बन्ध परिवार इसका सुन्दर उदाहरण है।

प्राथमिक नियन्त्रण – प्राथमिक समूह के सदस्य एक दूसरे से घनिष्ठ रूप में जुड़े होते हैं । पारस्परिक जान – पहचान के कारण .साध्य सम्बन्ध इनके व्यवहारों पर प्राथमिक नियन्त्रण बना रहता है । परिवार में वृद्ध पुरुषों का भय ही बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से रोके रखता है । प्रत्येक सदस्य अवचेतन ढंग से प्राथमिक समूह के आदर्शों एवं नियमों का पालन करता रहता है

स्थायित्व – प्राथमिक समूह शनै : -शनै : स्वत : विकसित होने के कारण स्थायी प्रकृति वाले होते हैं । व्यक्तिगत और घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण व्यक्ति इन समूहों की सदस्यता छोड़ना नहीं चाहता । स्थायी प्रकृति भी प्राथमिक समूहों की प्रमुख विशेषता मानी जाती है।

साध्य सम्बन्ध – प्राथमिक समूह के सदस्यों के सम्बन्ध स्व : साध्य होते हैं , सम्बन्ध उन पर थोपे नहीं जाते । स्वार्थपरता न होने के कारण इनके सम्बन्ध , लक्ष्य और मूल्य समझे जाते हैं । प्राथमिक समूह के सम्बन्ध साधन न होकर साध्य होते हैं। 

द्वितीयक समूह की विशेषताएँ 

द्वितीयक समूह को पूरी तरह से समझ लेने के लिए उनकी विशेषताओं से परिचित होना अनिवार्य है । द्वितीयक समूह में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती है 

  1. द्वितीयक समूह में आमने – सामने के सम्बन्ध न होने के कारण सदस्यों के बीच घनिष्ठता नहीं पायी जाती । 
  2. द्वितीयक समूहों में समीपता का अभाव होने के कारण सदस्यों के मध्य दूर – संचार के माध्यम से सम्बन्ध स्थापित होते हैं । 
  3. द्वितीयक समूह का निर्माण विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जान – बूझकर किया जाता है । 
  4. द्वितीयक समूह जीवन के किसी एक पहलू से सम्बन्ध रखते हैं ; अत : इनका प्रभाव व्यक्ति के किसी एक पक्ष पर ही विशेष पड़ता है । 
  5. द्वितीयक समूह में सम्बन्ध शर्तों या समझौते के आधार पर निश्चित किये जाते है । 
  6. द्वितीयक समूह में व्यक्ति के स्थान पर उसकी परिस्थिति का विशेष महत्त्व होता है ; अत : यहाँ सम्बन्धों में औपचारिकता पायी जाती है । 
  7. द्वितीयक समूह के सदस्यों के मध्य ‘ छुओ और जाओ ‘ का सम्बन्ध होने के कारण घनिष्ठता का नितान्त अभाव पाया जाता है । 
  8. द्वितीयक समूहों का निर्माण किया जाता है । इनमें स्वत : विकास का अभाव रहता है । आवश्यकताओं की प्रकृति परिवर्तित होने पर इन समूहों की प्रकृति में भी परिवर्तन आ जाता है । 
  9. द्वितीयक समूह का संचालन नियमानुसार होता है । 
  10. द्वितीयक समूह में सदस्यों का सम्बन्ध आमने सामने का न होने के कारण इनके दायित्व भी सीमित हो जाते हैं । 11. द्वितीयक समूह में सदस्य स्वहित की सोचते हैं ; अत : इनके सदस्यों में स्वार्थपरता पायी जाती है । ये दूसरे सदस्यों के साथ उतना ही सम्बन्ध रखते है जितना इनके हितों के लिए लाभप्रद और आवश्यक होता है।

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